गम तो तिल भर भी उसे छू न सके
ए खुदाया तू मेहरबान हो जा,
मित्र है वह मेरा निराला सा
उसके चेहरे का इब्तिसाम हो जा।
गम तो तिल भर भी उसे छू न सके
Comments
14 responses to “गम तो तिल भर भी उसे छू न सके”
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दोस्त के लिए दुआ मांगती हुई बहुत ख़ूबसूरत रचना ।
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सुन्दर समीक्षा हेतु आपको बहुत बहुत धन्यवाद, अभिवादन गीता जी
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दुआ कबूल होगी
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बहुत बहुत धन्यवाद ऋषि जी
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वेरी नाइस
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Thank you जी
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Khoob kaha
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Thank you sir
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बहुत ही सुन्दर
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बहुत बहुत धन्यवाद सुमन जी, हार्दिक आभार
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वाह वाह
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Thank you ji
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बढ़िया बहुत बढ़िया
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Dhanyvad ji
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