गुलाब

प्रेमी दिवस को यदि तुम्हें
मैं दे न पाया था गुलाब
तो न समझो बेवफा हूँ
व्यस्त था मैं बेहिसाब।
प्यार की निचली अदालत
में सबूतों की जगह
ले न जाना तुम इसे
टिक न पायेगा खिलाफ़।
प्रेम हो दिल में बसे हो
आज ही ले लो गुलाब
तुम तो मेरी जिंदगी में
खुद खिले से हो गुलाब।

Comments

12 responses to “गुलाब”

  1. वाह क्या बात है सर, बहुत खूब

  2. बहुत ही लाजवाब कविता, प्रेममयी कविता

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह वाह क्या बात है!!!!!! अतिसुंदर

    1. बहुत बहुत धन्यवाद और नमस्कार शास्त्री जी

  4. Geeta kumari

    श्रृंगार रस से सजी सुंदर कविता । प्रस्तुत कविता में कवि की अपने साथी के प्रति प्रेम व्यक्त करने की कोशिश हुई है । भावना प्रधान रचना, सुंदर शिल्प,और लय बद्ध शैली की प्रधानता है। बहुत खूबसूरत रचना..

    1. कविता की इससे सुन्दर समीक्षा और क्या हो सकती है गीता जी, इस उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक धन्यवाद।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  5. वाह पाण्डेय जी, बहुत खूब

    1. सादर धन्यवाद

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