टूट कर चारों तरफ बिखरा हुआ हूँ दोस्तो।
काँच सा तीखा, दिलों में, चुभ रहा हूँ दोस्तो।
फर्क इतना है कि मैं टूटा नहीं हूं खुद ब खुद।
मार कर पत्थर बड़े, रौंधा गया हूँ दोस्तो।
चुभ रहा हूँ दोस्तो
Comments
20 responses to “चुभ रहा हूँ दोस्तो”
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वाह जी वाह पाण्डेय जी
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सादर नमस्कार और धन्यवाद
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Nice poem
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Thanks
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Nice poem
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Thank you
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बहुत अछि लगी
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ह्रदयस्पर्शी..
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सादर धन्यवाद
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एक परेशान व्यक्ति की व्यथा का सटीक चित्रण।
हृदय स्पर्शी रचना….-
इस सुन्दर समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।
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सुंदर
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सादर धन्यवाद जी
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🙏✍👌✍👌
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धन्यवाद जी
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बहुत सुंदर रचना है
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बहुत सारा धन्यवाद जी
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सुन्दर
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सादर आभार जी
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बहुत सुन्दर 💐💐💐💐
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