चुभ रहा हूँ दोस्तो

टूट कर चारों तरफ बिखरा हुआ हूँ दोस्तो।
काँच सा तीखा, दिलों में, चुभ रहा हूँ दोस्तो।
फर्क इतना है कि मैं टूटा नहीं हूं खुद ब खुद।
मार कर पत्थर बड़े, रौंधा गया हूँ दोस्तो।

Comments

20 responses to “चुभ रहा हूँ दोस्तो”

  1. वाह जी वाह पाण्डेय जी

    1. सादर नमस्कार और धन्यवाद

  2. tiwari brother

    Nice poem

  3. RAVI TIWARI

    Nice poem

  4. RAVI TIWARI

    बहुत अछि लगी

  5. ह्रदयस्पर्शी..

    1. सादर धन्यवाद

  6. Geeta kumari

    एक परेशान व्यक्ति की व्यथा का सटीक चित्रण।
    हृदय स्पर्शी रचना….

    1. इस सुन्दर समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।

    1. सादर धन्यवाद जी

    1. धन्यवाद जी

  7. बहुत सुंदर रचना है

    1. Satish Pandey

      बहुत सारा धन्यवाद जी

    1. सादर आभार जी

  8. Subh Tiwari

    बहुत सुन्दर 💐💐💐💐

Leave a Reply

New Report

Close