जन्म भूमि की ओर चलें

जन्म भूमि की ओर चलें
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इस बेगाने शहर में मरने से अच्छा
अपनी जन्म भूमि की ओर चलें ।
भूख की जंग में मरने से अच्छा
मिट्टी की सोनी खुश्बू के बीच रहें।
एक ऐसा सफ़र,जहाँ पैरों का सहारा है
जहाँ गाङी नहीं,हौसलों का पंख हमारा है
हम प्रवासी,भाग्य से दो-चार होने को चलें—-
कितने कष्टों से होते हुए यह सफ़र पूर्ण हुआ
दहशत में ना रहो,गाँववासी हूँ वक्त का मारा हुआ
कष्ट न होगा ,अपनी जमी को अपना बनाने चले–
अब पलायन नहीं,यही आजीविका तलाशेंगे
खुद को साबित करने का अपना हुनर को तराशेंगे
संभावनाओ का ठौर बनाते हुए
शून्य से शुरूआत करने को चले—
सुमन आर्या
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Comments

11 responses to “जन्म भूमि की ओर चलें”

  1. Rajiv Mahali Avatar

    क्या बात है मेरा salute आपको

    1. Suman Kumari

      राजीवजी सादर आभार

  2. अतिसुन्दर रचना

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. सुंदर भाव

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  4. बहुत अच्छा

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  5. हमेशा की तरह अतुल्य रचना

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  6. बहुत सुंदर लेखनी

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