जल – धारा

कुंदन सी निखर गई,
टूटे मोती सी बिखर गई।
अंतर्मुखी सब कहने लगे,
सबका कहना सह गई मैं,
जल – धारा सी बह गई मैं ।

Comments

19 responses to “जल – धारा”

  1. कमाल की पंक्तियाँ

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद जी 🙏

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद भाई जी 🙏 आपका स्नेह यूं ही बना रहे।

  2. सबका कहना सह गई मैं,
    जल – धारा सी बह गई मैं
    लाजबाब कविता, सैल्यूट है।

    1. Geeta kumari

      बहुत अच्छी समीक्षा है । सादर आभार एवं धन्यवाद सर🙏

    1. Geeta kumari

      आभार सर🙏 बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Geeta kumari

      Thanks for your lovely comment indu ma’am.

  3. बहुत सुंदर

    1. बहुत बहुत शुक्रिया जी

  4. Rishi Kumar

    कुंदन का निखरना भी जरुरी था,
    टुटे माला यह भी जरुरी था|

    अंतर्मुख रहकर सिध्य किया,
    सत्य झूठ सह सकता,
    पर झूठ सत्य नहीं हो सकता|

    आप अपनी लेखनी में✍
    गागर मे सागर भरने का काम करतीं हैं 🙏

  5. Geeta kumari

    बहुत बहुत शुक्रिया आपका ऋषि जी🙏

    1. Geeta kumari

      Thank you very much 🙏

  6. Geeta kumari

    बहुत बहुत शुक्रिया ईशा जी💐

  7. मोहन सिंह मानुष Avatar

    सुन्दर अभिव्यक्ति

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