जाग जा

जाग जा
नई रोशनी का
आभास कर,
प्रातः हो गई है,
पौधों में चमकती
ओस की बूंदें,
बता रही हैं,
किस तरह नींद में
रोया होगा
रात भर तू।
जमाना तेरे आंसू
पोछे न पोछे
लेकिन सूरज सुखा देगा
तेरी ओस की बूंदें ।
प्रातः हो गई है
जो भुला देगी
तेरी दर्द भरी नींदें।
जो आंखों में आकर भी
अपनी न हो सकी नींदें।
कभी सुख के पाले में
कभी दुख के पाले में
उछलती रही रात भर गेंदें।
अब प्रातः हो गई है
अंधेरा चला गया है,
अब जाग जा
नई रोशनी का
आभास कर।

Comments

20 responses to “जाग जा”

    1. सादर धन्यवाद जी

  1. बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ

    1. धन्यवाद जी

  2. शानदार लेखन

  3. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति

    1. सादर धन्यवाद

    1. सादर धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  4. बेहतर लेखन का नमूना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

  5. Satish Pandey

    बहुत बहुत धन्यवाद

  6. Piyush Joshi

    बेहतरीन

    1. Satish Pandey

      Thanks

  7. Geeta kumari

    रात्रि के बाद प्रातः काल का यथार्थ चित्रण
    दुख के बाद सुख मिलने की आशा करती हुई बहुत सुंदर रचना है ।

    1. Satish Pandey

      कवि की पारखी नजर का अभिवादन, समीक्षा हेतु सादर आभार

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