जाग जा
नई रोशनी का
आभास कर,
प्रातः हो गई है,
पौधों में चमकती
ओस की बूंदें,
बता रही हैं,
किस तरह नींद में
रोया होगा
रात भर तू।
जमाना तेरे आंसू
पोछे न पोछे
लेकिन सूरज सुखा देगा
तेरी ओस की बूंदें ।
प्रातः हो गई है
जो भुला देगी
तेरी दर्द भरी नींदें।
जो आंखों में आकर भी
अपनी न हो सकी नींदें।
कभी सुख के पाले में
कभी दुख के पाले में
उछलती रही रात भर गेंदें।
अब प्रातः हो गई है
अंधेरा चला गया है,
अब जाग जा
नई रोशनी का
आभास कर।
जाग जा
Comments
20 responses to “जाग जा”
-
Sunder
-
सादर धन्यवाद जी
-
-

बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ
-
धन्यवाद जी
-
-

शानदार लेखन
-
थैंक्स
-
-

बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति
-
सादर धन्यवाद
-
-

खूबसूरत
-
सादर धन्यवाद
-
-
Nice
-
सादर धन्यवाद
-
-
बेहतर लेखन का नमूना
-
बहुत बहुत धन्यवाद जी
-
-

Very Nice
-
बहुत बहुत धन्यवाद
-

बेहतरीन
-
Thanks
-
-
रात्रि के बाद प्रातः काल का यथार्थ चित्रण
दुख के बाद सुख मिलने की आशा करती हुई बहुत सुंदर रचना है ।-
कवि की पारखी नजर का अभिवादन, समीक्षा हेतु सादर आभार
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.