जज़्बात

यूँ अपने जज़्बात नुमाया क्यों करते हो !
मेरी ख़ातिर अश्क बहाया क्यों करते हो !!

क़िस्मत के लिक्खे से मैं भी वाकिफ़ हूँ !
बातों से मुझको बहलाया क्यों करते हो !!

जब साथ तुम्हारा है ही नहीं मुक़द्दर में !
फिर मेरे ख़्वाबों में आया क्यों करते हो !!

भूल के तुमको जिसने जीना सीख लिया !
उसकी ख़ातिर नींदें ज़ाया क्यों करते हो !!

अपना बनकर दुनिया ज़ख़्म लगाती है !
सबको अपने राज़ बताया क्यों करते हो !!

पत्थर दिल इंसानों की इस बस्ती में !
तुम शीशे के महल बनाया क्यों करते हो !!

©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

Comments

7 responses to “जज़्बात”

  1. बहुत खूब, अतिसुन्दर रचना

  2. बहुत उम्दा रचना

  3. Geeta kumari

    हृदय के जज्बात बयां करती हुई बहुत सुंदर रचना

    1. अनुवाद

      धन्यवाद मैंम

  4. सुंदर भाव

  5. vikash kumar

    Jay ram jee ki

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