दम तोड़ती जिंदगी

अचानक से कर्ण में एक ध्वनि गूंजी ,

देखा तो भीड़ में कोई दम तोड़ रही थी,

पालन हार अपनी जिंदगी की जंग लड़ रही थी,

कटती अंग – प्रत्यंग के साथ काली घटा छा रही थी,

मानों अपनी कातर नजरों से बहुत कुछ कह रही थी,

प्राण खोने का भय न था उसमें जरा भी,

मानों किसी की तिवान उसे कचोट रही थी,

कौन देगा जीवन इस संसार को ?

पखेरू कहाँ  ढूंढेगा अपना बसेरा ?

बटोही ढूंढेगा छाँव कहाँ ?

सुत करेंगे किलोल कहाँ ?

ओह !….. उसकी पीड़ा असहनीय थी ,

सवालों के साथ जिंदगी ने भी दम तोड़ दी,

नेक इरादा मानव स्वार्थ के बली चढ़ गयी ,

अकस्मात घनघोर बादल छा गयी ,

मानों प्रकृति भी मातम माना रही ,

पर मानव इसबार भी मूक दर्शक बनी रही l

     इसबार भी मूक दर्शक बनी रही l l

                              Rajiv Mahali

Comments

12 responses to “दम तोड़ती जिंदगी”

  1. Praduman Amit

    कविता अच्छी है।

    1. Rajiv Mahali Avatar
      Rajiv Mahali

      Thank you

  2. Geeta kumari

    ह्रदय स्पर्शी रचना

    1. Rajiv Mahali Avatar
      Rajiv Mahali

      Thank you

    1. Rajiv Mahali Avatar
      Rajiv Mahali

      Thank you

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      Rajiv Mahali

      Thank you

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