दुःखी क्यों होते हो मित्र

दुःखी क्यों होते हो मित्र
मैं बढ़ रहा हूँ,
तुम भाग्य से पा चुके हो
में संघर्ष से पा रहा हूँ।
तुम कहते हो तो रुक जाता हूँ
गुमनाम हो जाता हूँ,
तुम्हारे या तुम्हारे अपनों के लिए
अपने कदमों को यहीं पर
विराम दे जाता हूँ।

Comments

12 responses to “दुःखी क्यों होते हो मित्र”

  1. बहुत खूब, बहुत शानदार

    1. सादर धन्यवाद जी

    1. बहुत सारा आभार

  2. Geeta kumari

    एक मित्र को सम्बोधित करती हुई बहुत सुंदर रचना।

    1. सुन्दर समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद

    1. सादर धन्यवाद शास्त्री जी

  3. समर्पण के सुंदर भाव

    1. सादर धन्यवाद जी

    1. बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी

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