दोधारी तलवार

क्यों दोधारी तलवार से हैं लोग…
क्यों सच को स्वीकार नहीं कर पाते हम लोग….

जानते हैं कुछ साथ नहीं कुछ जाना
फिर भी क्यों जोडने की होड़ में लगे हैं लोग…

सब कहते है भगवान एक है
फिर क्यों अनेक रूप साबित करने में लगे हैं लोग…

कहते हो अपने तो अपने होते हैं
फिर क्यों अपनों को बेगाना बनाने में लगे रहते हैं लोग…

क्यों दोधारी तलवार से हैं लोग…
क्यों सच को स्वीकार नहीं कर पाते हम लोग…।

Comments

10 responses to “दोधारी तलवार”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह वाह

    1. Anu Singla

      शुक्रिया जी

  2. Geeta kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. Anu Singla

    धन्यवाद जी

    1. धन्यवाद जी

  4. Praduman Amit

    वाह अन्नु जी। रचना में कही गई बात १०० प्रतिशत सही है।

    1. बहुत शुक्रिया जी

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