नाकाम

हम दो जिस्म
एक जान हो कर भी
ज़माने को हम
कहाँ झुका पाए
आज फिर ज़माना
मुहब्बत पे भारी पड़ी
आखिरी बार भी तुम्हें
कहाँ गले लगा पाए।

Comments

9 responses to “नाकाम”

  1. अतिसुन्दर, वाह,

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. सुंदर भाव

  4. Rishi Kumar

    👌✍

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