नारी हो या खुशियां सारी हो

कितनी जाजिब हो तुम
कितना मीठा कहती हो,
सबको खुश रखने को
सब कुछ खुद पर सहती हो।
परिवार बनाने वाली हो
प्यार लुटाने वाली हो
खुद तो सब कुछ हो मेरा
मुझको सब कुछ कहती हो।
जब से तुम आई जीवन में
तब से खुशहाली आई,
बाहर-भीतर घर-आंगन में
रौनक ही रौनक भर आई।
जन्नत बना दिया तुमने
अफसुर्दा आंगन को मेरे,
गुलशन महक उठा खिलकर
दसों दिशाओं में मेरे।
नारी हो या खुशियां सारी हो
जो जीवन में भर आई हैं,
तुम हो साथ तब ही मैंने
मंजिल की राहें पाई हैं।

Comments

14 responses to “नारी हो या खुशियां सारी हो”

    1. सादर धन्यवाद जी, 🙏🙏

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  1. Geeta kumari

    पति पत्नी के ख़ूबसूरत रिश्ते को दर्शाती बहुत ही सुन्दर रचना।
    कवि ने अपनी भावनाओं को बेहद शानदार तरीके से व्यक्त किया है।
    ………..लेखनी को प्रणाम…

    1. कविता के भाव तक पकड़ बनाने में आपकी पारखी नजर की क्षमता अतुलनीय है। बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी, प्रणाम

  2. वाह पाण्डेय जी

    1. धन्यवाद जी

  3. Harish Joshi

    बहुत ही सुन्दर पंक्तियां।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

    1. सादर धन्यवाद जी

  4. MS Lohaghat

    बहुत बढ़िया

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

Leave a Reply

New Report

Close