पता नहीं चलता।

बर्फ के टुकड़े सा है ये प्यार,
दगा का सूरज कब पींघला दे,
पता नहीं चलता।

वक्त बदले या ना बदले,
इंसान कब बदल जाए,
पता नहीं चलता।

अनजान चहरे समझ
लेते हैं हमें ;
आजकल,
अपनों में नहीं, कौन अपना
पता नहीं चलता।

राख के अन्दर; कोयला ढूंढता,
सूखे में से बूंदें सींचता,
उम्मीद का धागा कब टूंट जाएं;
पता नहीं चलता।

मैं झूठा हूं या सच्चा!
बुरा बहुत या अच्छा!
कब किसी की सोच बदले,
पता नहीं चलता।

कितना भी जताओ,
इश्क!
जितना जताओगे,
उतना ही गंवाओगे,
चैन !सूकुन ! नींद!
कब उड़ जाएं ,
पता नहीं चलता।
                      –मोहन सिंह (मानुष)

Comments

9 responses to “पता नहीं चलता।”

  1. Suman Kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत-बहुत आभार व धन्यवाद,😊

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      ,🙏

  3. Priya Choudhary

    Wah very nice

  4. Geeta kumari

    सुंदर रचना

  5. सुंदर अपना सुंदर अभिव्यक्ति तथा सुंदर कविता

  6. Pratima chaudhary

    बहुत ही बेहतरीन

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