पूर्णिमा

पूर्णिमा जब चांदनी
धरती पर आकर पसारती है
लगे चांदी के आभूषण से
धरती का रूप सवारती है
मां के पास आंगन में सोए
नन्हे शिशु पर छांव करें
उसे हरी समझ कर पूज गईं
पड़ी किरण शिशु के पांव तले
जब शीत पवन के झोंके से
उन द्खतौ ने अंगड़ाई ली
मां कहे कि पवन सताती है
फिर चादर से परछाई की
यह देख चांदनी रूठ गई
मां ने चादर की ओट करी
जब कई घड़ी बालक ना दिखा
वह फिर बादल में लौट गई

Comments

14 responses to “पूर्णिमा”

  1. Suman Kumari

    पूर्णिमा की छटा ही ऐसी होती है,बुझते हुए मन में आशाओं की बीज बोती है

    1. Suman Kumari

      सुन्दर अभिव्यक्ति

    2. धन्यवाद आपका

  2. Rajiv Mahali Avatar

    बहुत सुन्दर

    1. थैंक्स 🙏🙏

  3. वाह वाह, अतिसुन्दर रचना,

    1. धन्यवाद आपका 🙏🙏🙏

  4. अति सुंदर

  5. सुन्दर अभिव्यक्ति

  6. अच्छी अभिव्यक्ति की है अपने अन्तर्मन की
    Keep it up

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