एक ही तो खिड़की थी
जिससे दीदार हो जाता था
खिड़की खोलने-बंद करने में
ही इजहार हो जाता था
आज वो भी बंद कर दी तुमने.!
अब वो हंसी नजारे कैसे होंगे ?
भेजा करते थे जो एक खिड़की से
दूसरी खिड़की पर हम चिट्ठियां
अब वो इशारे कैसे होंगे ?
रात भर देखते थे उठ-उठकर
तुम्हें खिड़की से
अब तो तुम्हारे दीदार को
तरसते चाँद-तारे होंगे
खोल दो ना वो प्यार वाली खिड़की*
तुम्हें रब का वास्ता’
वरना हम भगवान को प्यारे होंगे ||
“प्यार वाली खिड़की”
Comments
9 responses to ““प्यार वाली खिड़की””
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अतिसुंदर
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धन्यवाद
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सुन्दर रचना
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धन्यवाद
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Tq
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प्रेम के प्रति भाव अति सुंदर है।
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धन्यवाद सर आपकी सुंदर समीक्षा के लिए
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Nyc
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