बरसेगी धरती पे कब सावन के फुहार।
बता ए घटा कब आएगी बसंत बहार।।
मोर पपीहा भी मिलन के गीत गुनगुनाने लगे।
मन के बगिया मे सैंकड़ों फूल खिलने लगे।।
बसंत बहार

Comments
6 responses to “बसंत बहार”
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बहुत खूब
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समीक्षा के लिए धन्यवाद।
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उम्दा लेखन
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आपकी समीक्षा ही मेरे हौसले को बुलंद करती है।
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बहुत सुंदर लिखा है, वाह
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पांडे जी। आप हमेशा की तरह इस बार भी मेरी कविता को सराहा। बहुत बहुत धन्यवाद।
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