बह रही प्यार की सरिता
कहे मन लिख डालूँ एक कविता
सारा नेह निचोड़ दूँ इसमें
खिल जाये सुन वनिता ।
डोर हमारी और तुम्हारी
मजबूती से बंधी रहे यह
गीत उगें बस, नेह भरे ही,
राग भरे हों ललिता।
लिख डालूँ एक कविता।
प्यार की बह जाये सरिता।
सुर में सुर और ताल मिलाकर
मन के भीतर प्रेम बसाकर
उमंग का मृदङ्ग
खूब बजाकर,
लिख डालूँ एक कविता।
बह रही प्यार की सरिता
Comments
8 responses to “बह रही प्यार की सरिता”
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बहुत लाजवाब वाह
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अति उम्दा
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उमंग का मृदङ्ग
खूब बजाकर,
लिख डालूँ एक कविता।
________ आपकी यह कविता इतनी सुंदर है कि इसे पढ़ते ही ऐसा लगा जैसे ढोल मृदंग स्वतः ही बज उठे हों…. साहित्य को कविता के माध्यम से उकेरती हुई सुंदर शिल्प और भाव लिए हुए कवि सतीश जी की बहुत ही शानदार रचना -
वाह
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बहुत खूब, अति सुंदर
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बहुत खूब
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बह रही प्यार की सरिता
कहे मन लिख डालूँ एक कविताJay ram jee ki
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कवि सतीश जी की बेहद माधुरी पूर्ण कविता जिसमें संगीत को प्राथमिकता दी गई हैं
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