सामने बोल भी नहीं पाये
आँख हम खोल भी नहीं पाये
था वजन बात में भरा कितना
उसको हम तोल भी नहीं पाये।
आँख चुँधिया गई थी जब अपनी
धूल औरों में झोंक कर आये,
गा चुके गीत जब थे वे अपने
तब कहीं फाग हम सुना आये।
उनकी कोशिश थी जल छिड़कने की
उस जगह आग हम लगा आये,
साफ कालीन-दन बिछाए थे,
उनमें नौ दाग लगाकर आये।
जितनी शंका भरी थी उनके मन
सारी हम दूर भागकर आये,
तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं
बिन कहे बात बताकर आये ।
वे कभी खत लिखें या आ जायें,
सोचकर हम पता लिखा आये,
दिल की सुनते हैं नहीं ठुकराते
यह नियम हम उन्हें सिखा आये।
बिन कहे बात बताकर आये
Comments
9 responses to “बिन कहे बात बताकर आये”
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बहुत बढ़िया कविता वाह
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उत्तम रचना
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गा चुके गीत जब थे वे अपने
तब कहीं फाग हम सुना आये।
_____ जीवन की अनुभूतियों का चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी एक श्रेष्ठ रचना। लाजवाब अभिव्यक्ति -

अति सुंदर, बहुत ख़ूब
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बहुत सुंदर रचना 🙏
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बहुत खूब
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Great
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अतिसुंदर
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हृय की पीर को दर्शाती हुई रचना
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