भेदभाव की बातें छोड़ो
भारत देश सजाओ ऐसे
जिसमें सभी समान रूप से
गुँथे हुए हों माला जैसे।
जाति-धर्म के भेद हमारी
एका को कमजोर कर रहे,
वो छोटा मैं बड़ा कह रहे
नफरत व्यापार कर रहे।
भेदभाव है भीतर का घुन
इस घुन को अब दूर भगाओ,
सभी मनुष्य एक जैसे हैं
बस एका का भाव जगाओ।
भेदभाव की बातें छोड़ो
Comments
20 responses to “भेदभाव की बातें छोड़ो”
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बहुत सुंदर भावनाओं से सुसज्जित सुंदर रचना।मजबूत लेखनी की परिचायक।
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आपकी इस तरह की प्रेरणादायक पंक्तियाँ सदैव प्रोत्साहित करती हैं, सादर धन्यवाद
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Bahut sundar
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Thanks जी
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अतिसुंदर भाव
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उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक धन्यवाद शास्त्री जी
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हमारे देश के विकाशपथ के हर कंटक का बहुत ही सटीक चित्रण किया है आपने ।
हमारी प्रगति के सबसे बङे अवरोधक-
धन्यवाद जी, निश्चित तौर पर हमारे सामाजिक ताने -बाने में व्याप्त भेद की भावना प्रगति की सबसे बड़ी बाधक है।
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अतिसुन्दर भावनाएं
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बहुत बहुत धन्यवाद सर जी
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बहुत अच्छे
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Well said
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Thanks
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Very true
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Thanks
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हे समाज के दर्पण
क्यों सच कहते कहते रुक गए|
डर था किसी का क्या, हे मानवता के राही,
फिर सच लिखने से क्यों रुक गए|यह बात पुरानी हो गई है
इससे अब कुछ मिलता ना|
क्यों बाड़ छुपा रखा तरकस में,
उठा अब भी कुछ बिगड़ा ना|
✍✍✍✍✍✍✍🙏
बस सच्चाई से एक कदम दूर हैं
बहुत खूबसूरत कविता-
आपने इतनी सुंदर पंक्तियाँ कही, मन भावविभोर हो गया, बहुत सारा धन्यवाद ऋषि सर
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यह हमारी कविता की पंक्ति है
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Welcome
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