भेदभाव की बातें छोड़ो

भेदभाव की बातें छोड़ो
भारत देश सजाओ ऐसे
जिसमें सभी समान रूप से
गुँथे हुए हों माला जैसे।
जाति-धर्म के भेद हमारी
एका को कमजोर कर रहे,
वो छोटा मैं बड़ा कह रहे
नफरत व्यापार कर रहे।
भेदभाव है भीतर का घुन
इस घुन को अब दूर भगाओ,
सभी मनुष्य एक जैसे हैं
बस एका का भाव जगाओ।

Comments

20 responses to “भेदभाव की बातें छोड़ो”

  1. Geeta kumari

    बहुत सुंदर भावनाओं से सुसज्जित सुंदर रचना।मजबूत लेखनी की परिचायक।

    1. Satish Pandey

      आपकी इस तरह की प्रेरणादायक पंक्तियाँ सदैव प्रोत्साहित करती हैं, सादर धन्यवाद

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक धन्यवाद शास्त्री जी

  3. हमारे देश के विकाशपथ के हर कंटक का बहुत ही सटीक चित्रण किया है आपने ।
    हमारी प्रगति के सबसे बङे अवरोधक

    1. धन्यवाद जी, निश्चित तौर पर हमारे सामाजिक ताने -बाने में व्याप्त भेद की भावना प्रगति की सबसे बड़ी बाधक है।

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    अतिसुन्दर भावनाएं

    1. बहुत बहुत धन्यवाद सर जी

  5. बहुत अच्छे

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      Thanks

    1. Satish Pandey

      Thanks

  6. Rishi Kumar

    हे समाज के दर्पण
    क्यों सच कहते कहते रुक गए|
    डर था किसी का क्या, हे मानवता के राही,
    फिर सच लिखने से क्यों रुक गए|

    यह बात पुरानी हो गई है
    इससे अब कुछ मिलता ना|
    क्यों बाड़ छुपा रखा तरकस में,
    उठा अब भी कुछ बिगड़ा ना|
    ✍✍✍✍✍✍✍🙏
    बस सच्चाई से एक कदम दूर हैं
    बहुत खूबसूरत कविता

    1. Satish Pandey

      आपने इतनी सुंदर पंक्तियाँ कही, मन भावविभोर हो गया, बहुत सारा धन्यवाद ऋषि सर

      1. यह हमारी कविता की पंक्ति है

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