जरा सी भी तुम्हें
असली खुशी
गर आज मिल जाये।
पकड़ कर कैद कर लेना
मगर अभिमान मत करना,
उग रहा हो अगर सूरज
तो उगने दो, उगेगा ही,
उसे तुम देख गुस्से से
नयन कमजोर मत करना।
मगर अभिमान मत करना
Comments
13 responses to “मगर अभिमान मत करना”
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वाह वाह सर, बहुत खूब
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धन्यवाद जी
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बेहतरीन सर👌👍👍
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धन्यवाद सर
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अतिसुन्दर
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बहुत धन्यवाद जी
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बहुत सुंदर लाजवाब👌👌
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कवि सतीश जी ने अपनी कविता के माध्यम से बहुत ही सुन्दर सन्देश दिया है कि प्रगति की राह पर चलते चलते ऊंचाइयों पर पहुंचने पर अभिमान नहीं करना है क्योंकि फलों से लदा हुआ वृक्ष हमेशा झुका हुआ ही होता है और सीधे तने हुए तो ठूंठ ही होते हैं । बहुत सुंदर प्रस्तुति ।अभिवादन सर
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🤔❤🙂👌✍✍✍
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अतिसुंदर भाव
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बहुत सुंदर कविता
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बहुत सुंदर।
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Nice, very nice, wow
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