मगर अभिमान मत करना

जरा सी भी तुम्हें
असली खुशी
गर आज मिल जाये।
पकड़ कर कैद कर लेना
मगर अभिमान मत करना,
उग रहा हो अगर सूरज
तो उगने दो, उगेगा ही,
उसे तुम देख गुस्से से
नयन कमजोर मत करना।

Comments

13 responses to “मगर अभिमान मत करना”

  1. वाह वाह सर, बहुत खूब

    1. धन्यवाद जी

  2. Deepak Kumar

    बेहतरीन सर👌👍👍

    1. धन्यवाद सर

  3. अतिसुन्दर

    1. बहुत धन्यवाद जी

  4. harish pandey

    बहुत सुंदर लाजवाब👌👌

  5. Geeta kumari

    कवि सतीश जी ने अपनी कविता के माध्यम से बहुत ही सुन्दर सन्देश दिया है कि प्रगति की राह पर चलते चलते ऊंचाइयों पर पहुंचने पर अभिमान नहीं करना है क्योंकि फलों से लदा हुआ वृक्ष हमेशा झुका हुआ ही होता है और सीधे तने हुए तो ठूंठ ही होते हैं । बहुत सुंदर प्रस्तुति ।अभिवादन सर

  6. 🤔❤🙂👌✍✍✍

  7. बहुत सुंदर कविता

  8. Harish Joshi

    बहुत सुंदर।

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