मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को
उनकी सेवा में खुद को लगा ले,
यह तो मौका मिला है तुझे
आज मौके का फायदा उठा ले।
एक दिन सबने माटी में घुल के
शून्यता में समाना है प्यारे
आज वे वृद्ध हैं कल तू होगा,
अपने कल के लिए ही कमा ले।
आज जैसा करेगा तुझे कल
तेरी संतान से वो मिलेगा
ब्याज भी मूल के साथ होगा,
जो भी अच्छा-बुरा तू करेगा।
बूढ़े मां-बाप घर की हैं पूँजी
घर अधूरा है उनके बिना,
पूज ले वृद्ध मां-बाप को
अपने कल के लिए तू कमा ले।
– – – डॉ0 सतीश पाण्डेय
मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को
Comments
26 responses to “मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को”
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बेहतरीन
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सादर धन्यवाद
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बहुत सुंदर विचार
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धन्यवाद गीता जी
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बहुत खूब
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धन्यवाद जी
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धन्यवाद कैसा सर
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इतनी सुंदर कविता लिखने को धन्यवाद
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थैंक्स
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वाह
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Thank you
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अति उत्तम विचार
हरघर में पनपे यह सद् विचार-
सुमन जी को हार्दिक धन्यवाद
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बहुत सुन्दर।
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सादर धन्यवाद जी
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बहुत सुंदर विचार
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सादर आभार जी
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Waah
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Thanks Neha Ji
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क्या कहने बहुत बढ़िया
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Thanks
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बहुत सटीक कहा है
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Thank you
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True
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Thanks
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Very true
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