हे नियंता! दैव! प्रकृति!
मानव जाति विकट विपदा में है,
चारों तरफ रोग फैला है,
इससे निजात दिला।
चीन के वुहान से निकल कर
पूरी दुनियां को चपेट में ले लिया,
जिंदगी ठप्प कर दी,
भारी संख्या में
बेरोजगार हो गए लोग।
काम-धंधा चौपट हो गया,
इस रोग से निजात दिला,
वैज्ञानिकों के हाथों में अब
सफलता दे दे,
आस लगाई हुई है दुनिया
सफलता दे दे।
हे नियंता! दैव! प्रकृति!
मानव जाति विकट विपदा में है,
चारों तरफ रोग फैला है,
इससे निजात दिला।
मानव जाति विकट विपदा में है
Comments
10 responses to “मानव जाति विकट विपदा में है”
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Nice thoughts
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बहुत बहुत धन्यवाद
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सच बात है
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सादर धन्यवाद
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सरल शब्दो में सुन्दर प्रस्तुति
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मेरी कविता पर इतनी सुंदर टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद
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Sunder
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आपका स्नेह और आशिर्वाद सदैव साथ रहे शास्त्री जी
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत खूब, सुन्दर
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