”मेरा भोला प्रियतम”
जिनकी नज़रों से ललित कलाएं निकलती हैं,
अधरों पर राग अंगड़ाइयां लेते हैं।
केशों से बसंत दुग्ध पान करती है,
और रात अठखेलियां करती है जिनसे।
जिनकी एक चितवन मात्र से,
बिजलियां चमकने लगती हैं ।
अनगिनत दीप जल उठते हैं,
जिनके लावण्य की माधुरी से ।
विस्मय हो उठती हैं किरणें,
जिनकी अगाध छटा से।
प्रकृति मांगती है सौंदर्य जिनसे
ऐसा है ‘मेरा भोला प्रियतम’ ।
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