मैं बीता कल हूँ भले ही

मैं बीता कल हूँ भले ही
तुम्हारे लिए ,
पर किस के लिए तो
आज हूँ मैं।
तुम्हारी नजर में
बेवफा हूँ।
पर किसी वफ़ा का नाज हूँ मैं।
स्वयं ठुकरा के
मेरी बाहों को,
तुम उछालो भले ही
कीच मुझ पर,
तब भी तुमसे नहीं
नाराज हूँ मैं।
उतार फेंका जिसे
वो गले का हार हूँ मैं,
तुम्हारा कुछ भी नहीं अब
किसी का ताज हूँ मैं।
मैं बीता कल हूँ भले ही
तुम्हारे लिए ,
पर किस के लिए तो
आज हूँ मैं।

Comments

17 responses to “मैं बीता कल हूँ भले ही”

  1. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब

    1. धन्यवाद जी

  2. बहुत अच्छी पंक्तियाँ

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

  3. Satish Pandey

    टाइपिंग मिस्टेक हुई है, सुधार सेवा में प्रस्तुत है-
    मैं बीता कल हूँ भले ही
    तुम्हारे लिए ,
    पर किसी के लिए तो
    आज हूँ मैं।

  4. Pragya Shukla

    Good

    1. Satish Pandey

      Thanks

  5. सुन्दर प्रस्तुति

    1. Satish Pandey

      Thanks ji

  6. Chandra Pandey

    बहुत शानदार

    1. Satish Pandey

      Thanks

  7. Piyush Joshi

    बहुत खूब

    1. Satish Pandey

      Thanks

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