आँखों में जब उमड़ है उठता
बीता हुआ अतीत
फिजाओं में तब गूंज हैं
उठते भूले-बिसरे गीत
एक-एक कर स्मृति में
वो पल घुमड़-घुमड़
आ आते हैं
ना जाने अब कहाँ खो गये
वो पल वो मनमीत
यादों की परछाईं जब
धुंधली पड़ जाती हैं
महक उठते हैं सपने प्यारे
तरुणाई मुसकाती है
चल देती हूँ जब मैं
मीठे लम्हों की बारातों में
विरहिणी आँखों से
पावस मचल-मचल
बह जाती है…
यादों की परछाईं
Comments
9 responses to “यादों की परछाईं”
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सुंदर
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Thanks
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बहुत ही भाव पूर्ण रचना है प्रज्ञा जी । बहुत सुंदर प्रस्तुति
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Thanks
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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Thanks
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bahut hii bhawapurn rachana yado ki parchhai
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आभार सर
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बहुत ही सुंदर रचना
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