सावन की रिमझिम बूंदें

सावन की रिमझिम बूंदों में,
भीगे तुम भी, भीगे हम भी
भीग गया है तन – मन सारा।
नभ से मेघा जल बरसाते,
धरती को हैं सरस बनाते
गीले हैं आगे के रस्ते।
अरे! अरे, आगे फिसलन है,
ज़रा संभलकर, हाथ पकड़कर
फिसल ना जाए पांव हमारा।
पवन तेज़ है, छतरी भी उड़ गई
कैसे पहुंचें अभी दूर है, लक्ष्य हमारा।

Comments

22 responses to “सावन की रिमझिम बूंदें”

    1. Geeta kumari

      Thank you very much 🙏

  1. बहुत बढ़िया

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

  2. Satish Pandey

    वाह
    भीगे तुम भी, भीगे हम भी
    भीग गया है तन – मन सारा।
    नभ से मेघा जल बरसाते,
    धरती को हैं सरस बनाते
    बहुत सुंदर पंक्तियाँ, लेखन प्रतिभा की उत्कृष्टता को दर्शाती कविता।

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी 🙏 आपकी प्रेरक समीक्षाएं मुझे और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करती हैं। आपका हृदय से आभार।

  3. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बारिश के मौसम का लुफ़्त उठाने का अलग ही अनुभव होता है
    रिम -झिम बारिश की बूंदें जब तन पर गिरती है काया आनंदित हो जाती है और चारों तरफ हरियाली को देखकर मन भी खुश हो जाता है
    अतिसुंदर भाव

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद मोहन जी 🙏 इस सुन्दर समीक्षा के लिए बहुत आभार।

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद भाई जी 🙏

  4. प्राकृतिक सुंदरता की सुन्दर प्रस्तुति

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद प्रतिमा जी🙏

  5. वाह बहुत शानदार

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत शुक्रिया जी 🙏

    1. Geeta kumari

      Thank you very much chandra ji 🙏

  6. बहुत उम्दा

  7. Piyush Joshi

    बहुत लाजवाब

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद पीयूष जी 🙏

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