सुनो गाँव ! अब परदेश ना जाना

आयी विपदा न कोई सहाय हुआ
छूटा रोजगार बहुत बुरा हाल हुआ
तुम्हारा कष्ट भी किसी ने न जाना
पसीने से सींचा जिन शहरों को…
किसी ने तनिक एहसान न माना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।।

छोड़ आये थे तुम जिसे एक दिन
आयी फिर उस गाँव-घर की याद
पश्चाताप की इस कठिन घड़ी में
न ही तेरा कोई हुआ सहाय…
गाँव का सफ़र पैदल पड़ा नापना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।।

तुम गाँव मे रहकर मेहनत खूब कर लेना
परिवार का भरण पोषण भी कर लेना
मन हो भ्रमित तो याद फिर…
खूब उन विपदा के पलों को कर लेना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।
सुनो गाँव!अब परदेश न जाना।।

Comments

8 responses to “सुनो गाँव ! अब परदेश ना जाना”

    1. आभार आपका

    1. Pragya Shukla

      🙏

  1. अति सुन्दर रचना 👌👌

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