हंसते हो महीने में

मनोरम रात है
बिखरी हुई है चांदनी
तुम्हारी मुस्कुराहट सी
दिखाई दे रही है चांदनी।
जिस तरह चाँद खिलता है
कभी कुछ दिन महीने में,
उसी की भांति तुम भी हो
जो हंसते हो महीने में,
देता है जब मालिक कभी
वेतन महीने में।

Comments

12 responses to “हंसते हो महीने में”

  1. वाह क्या बात है, प्रकृति की चमक को पगार मिलने की चमक से जोड़ा है वाह

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत खूब, अति उम्दा

    1. सादर धन्यवाद जी

    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी

  3. Geeta kumari

    बहुत ही सुन्दर कविता है सतीश जी ” जिस तरह चांद खिलता है,कभी कुछ दिन महीने में, उसी की भांति तुम भी हो । जो हंसते हो महीने में “।
    श्रृंगार रस से परिपूर्ण अति सुंदर कविता ।

    1. सादर अभिवादन। इस सुंदर और लाजवाब समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद गीता जी। आपकी समीक्षा प्रेरणादायी है। जय हो

  4. बहुत उम्दा पंक्तियां

    1. सादर धन्यवाद प्रज्ञा जी

  5. Seema Chaudhary

    सुन्दर कविता

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