होली

बजे ढोलक,बजे नगमे
मचे हुड़दंग होली में
रंगी धरती, रंगा अंबर
उड़े है रंग होली में ।
कोई गुब्बारे से खेले तो
कोई मारे पिचकारी
पड़ी है पान की छीटें
चढ़े हैं भंग होली में।

घुला है बाल्टी में रंग
और तैयार पिचकारी
आपकी राह देखे है
सांवरे राधा तुम्हारी
आपके आते ही हम
आपको यूँ रंग डालेंगे
भूल जाओगे तुम राधा
याद आएंगे गिरधारी ।

आपको रंग डालेंगे
हाथ में रंग है पीला
पहले सूखा लगाएंगे
भर के पिचकारी में गीला
आप जब गुस्से में आकर के
हम पर तिलमिलाओगे
आपका साँवला मुखड़ा
कर देंगे बैंगनी-नीला।

हमने पकवान और गुझिया
बनाई आपकी खातिर
मिठाई फूल और तोहफे
मंगाए आपकी खातिर
अपने घर को हमने है
बनाया स्वर्ग से सुंदर
अपने आपको हमने संवारा
आपकी खातिर।

Comments

52 responses to “होली”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Good

  2. अति सुन्दर रचना

  3. सुंदर भाव हैं

  4. PRAGYA SHUKLA Avatar

    बहुत बढिया लिखा है

  5. बहुत उम्दा रचना

  6. 👏👏👏👌👌👌👌👌

  7. सुंदर अभिव्यक्ति

  8. अच्छा लिखा है

  9. This comment is currently unavailable

  10. Anurag Shukla Avatar

    बहुत ही सुन्दर कविता

  11. Roopraani Ji

    Good

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद

  12. Reetu Honey

    अति सुन्दर रचना

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद

  13. Honey Shukla

    सुन्दर रचना

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद

  14. Honey Shukla

    Nice

    1. Pragya Shukla

      Thanks

  15. King radhe King

    सुंदर-सुंदर

    1. Pragya Shukla

      Thanks

  16. Reema Raj

    खूबसूरत

    1. Pragya Shukla

      Thanks

  17. Nikhil Agrawal

    Bahut bahut badhai

    1. आपको भी बधाई

  18. Pratima chaudhary

    शानदार

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