कितनी बेबस हैं लोह-पथ-गामिनी (रेलगाड़ी)
की खिड़कियों से झांकती 👁आंखें।
इन आंखों में अनगिनत प्रश्न उपस्थित हैं।
कितनी आशाएं कीर्तिमान हो रही हैं ।
अपने परिजनों से मिलन की उत्सुकता
ह्रदय को अधीर कर रही है।
परंतु कोरोना महामारी का भय
यह सोचने पर मजबूर कर रहा है,
कि कहीं अपने परिजनों को हम
भेंट स्वरूप कोरोना महामारी तो
प्रदान नहीं कर रहे?
यह बात लोह-पथ-गामिनी के इन
सहयात्रियों को व्यथित कर रही है।
मुख पर लगा मुखौटा(मास्क),
इंनकी इस धारणा को बखूबी प्रदर्शित कर रहा है।
इन श्रमिकों, प्रवासी मजदूरों को
इस बात की अत्यंत खुशी है
कि एक अर्से के बाद
जिस रोटी की तलाश में वो परदेस गए थे।
आज उसी रोटी की अभिलाषा में
अपने गंतव्य प्रस्थान करेंगे।
रूखी सूखी खाकर ही,
अपनी जठराग्नि को शांत करेंगे।
“मजबूरी में मजदूरी की
मजबूरी में घर से निकले।
आज फिर मजबूरी में
मजदूरी छोड़ प्रवासी पहुंचेंगे।।”
“खिड़कियों से झांकती आँखें”
Comments
29 responses to ““खिड़कियों से झांकती आँखें””
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🙏🙏
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आपकी रचना बहुत ही सुन्दर है 👏👏
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🙏🙏
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बेहतरीन चित्रण
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धन्यवाद
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आपकी कविता में वास्तविकता है।
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थैंक्स
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सुन्दर रचना
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Thanks dear
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बेहद खूबसूरत
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🙏🙏
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काबिले तारीफ👌👌👏👏
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थैंक्स
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👏👏
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धन्यवाद आपका
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सुन्दर
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थैंक्स फॉर कमेंट्स
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जठराग्नि
1.
पेट के अंदर का शारीरिक ताप जो भोजन पचाने का काम करता है।
2.
पाचन शक्ति।
आपने शब्द का प्रयोग किस औचित्य से किया है कृपया समझाइए.
चंद्रबिंदु की तो बात ही नहीं करते उसकी बात फिर कभी.
#इंनकी# इस धारणा को बखूबी प्रदर्शित कर रहा है।
इसमें भी हैशटेक के बीच आए शब्द का अर्थ जानने की इच्छुक हूँ-
Jarharaagni ka arth yaha roti ko khakar pachane we hai,inki par bindu galati she aaya or baataiye kya peeda hai aapko?
Waise aalochana ke liye dhanyawaad.
Mujhe be had pasand gain mujhame kami nikalane waale.kyooki wahi sachche dost hotel hain
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Beautiful
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🙏
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वाह
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🙏
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बधाई हो प्रज्ञा जी।
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🙏
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👌👌
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अति सुंदर
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