“माँ मुझे विवाह नहीं करना”

समाज में स्त्रियों की दशा देखकर
मेरे मन में उठे विचार:-

माँ मुझे विवाह नहीं करना।
पति की परछाई बनकर,
पति के पीछे-पीछे नहीं चलना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

अपने कलेजे के टुकड़े(संतान) पर,
पति का आधिपत्य स्थापित नहीं करना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

परिजनों की दी पहचान मिटा,
ससुराल की प्रथा नहीं बनना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

अपनी लीक से हटकर,
पति की डगर नहीं चुनना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

अपने सपनों की रोशनी मिटा,
अंधेरों में मुझे नहीं मिलना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

खुद अपना अस्तित्व मिटा,
सम्बंधों की बलि नहीं चढ़ना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

Comments

12 responses to ““माँ मुझे विवाह नहीं करना””

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  2. Pragya Shukla

    धन्यवाद

  3. स्त्रियों की दशा पर अच्छी रचना

  4. समाज में विवाहित स्त्रियों की स्थिति को देखकर कवित्री के मन में जो भाउट रहे हैं वह सहज व स भाविक है

  5. सुंदर अभिव्यक्ति

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