नारी का अस्तित्व नहीं…

कहते हैं नारी पानी-सी होती है
जिस रिश्ते में बंधती है
उसी की हो जाती है।
पर प्रज्ञा की यही वेदना है
क्या नारी का कोई अस्तित्व नहीं?
वह पानी-सी है।
उसका कोई स्वरूप नहीं?
वह सदियों से पुरुषों की है
उसकी कोई पहचान नहीं?
नारी तो जगजननी है
हर रूप में वन्दनीय है।
वह हर स्वरूप में सुन्दर है
उस सम कोई परिपूर्ण नहीं।
नारी दुर्गा है, जगजननी है,
जीवन की सुंदर प्रतिमा है।
पुरुषों के जीवन की आधारशिला
नारी के कन्धों पर ही अवस्थिति है।

Comments

13 responses to “नारी का अस्तित्व नहीं…”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति।
    नारी की महिमा एवं उसकी समाज में श्रेष्ठता को बतलाती हुई, सफल रचना।

  2. Pragya Shukla

    मेरी पहली कविता पर
    इतना अच्छा कमेंट करने के लिए 🙏🙏

  3. Satish Pandey

    “नारी पानी-सी होती है”
    बहुत खूब, लाजबाब कविता

    1. आभार आपका

  4. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बेहतरीन

    1. धन्यवाद आपका

  5. This comment is currently unavailable

  6. नारी की महिमा का सुन्दर बखान

    1. Pragya Shukla

      🙏🙏🙏

  7. vivek singhal

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  8. vivek singhal

    This comment is currently unavailable

  9. बहुत सुंदर पंक्तियां

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