डर लगता है

‘गुज़री कुछ यूँ कि अब तन्हाई से डर लगता है,
हमें तो अपनी ही परछाई से डर लगता है..

गहराई अब तो समंदर की बेअसर हैं यहाँ,
हमें तो इश्क की गहराई से डर लगता है..

इक अदा थी जो गिरफ्तार कर गई हमको,
आजकल हर हसीं अंगड़ाई से डर लगता है..

जान पहचान ने ही दर-बदर किया हमको,
अब तो हर शख्स की आशनाई से डर लगता है..’

– प्रयाग

मायने :
आशनाई – पहचान

Comments

12 responses to “डर लगता है”

  1. Geeta kumari

    अति सुंदर प्रस्तुति

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बेहतरीन

    1. आभार आपका

  3. सुंदर रचना

    1. बहुत शुक्रिया

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