दुल्हन

ओस के मोतियों जड़ा
एक हर बनाऊ मैं
फलक के सितारों से
तेरी मांग सजाऊंगा मैं ।
काली घटाओं से मांग लूं
तेरी आंखों का काजल
झिलमिलाती लहरों से
बनाऊं तेरी पायल ।
श्वेत चांदनी से बुनकर
पहनाऊं तुझे चुनरी
सागरों के सीपो जड़ी हो
तेरी अंगुलियों की मुंदरी ।
डूबते सूरज की
सिंदूरी शाम से लेकर
एक चुटकी भर दूं
तेरी मांग में ।
प्रकृति के अनमोल गहनों से
सजी फिर उस दुल्हन का
मैं घुंघट उठाऊं
उसी की आंखों में खो जाऊं
उसी की बाहों में सो जाऊं।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज

Comments

12 responses to “दुल्हन”

  1. बहुत खूब, सुन्दर

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      आभार

  2. Geeta kumari

    प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम प्रस्तुतीकरण। बहुत सुंदर रचना।

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      आभार

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      आभार

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      आभार

  3. सुंदर अभिव्यक्ति

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      आभार

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    हर-हार
    …..
    प्रकृति के उपमानों का बहुत ही सुंदर प्रयोग
    बेहतरीन रचना,👏👏

    1. Virendra sen Avatar
      Virendra sen

      आभार

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