करुण कथा मेहनतकश की

कुछ तो बेबसी रही होगी,
जो राहों पर निकल पड़ा मज़दूर।
ना साधन है ना रोटी है,,
निज घर जाने को मजबूर।
कुछ सपने लेकर आया था शहर,
वो सपने हो गए चकनाचूर ।
कड़ी धूप है, ना कोई छाया,
कब से इसने कुछ नहीं खाया।
भूखा कब तक मरे यहां,
घर भी तो है कोसों दूर।
फ़िर भी बच्चों को ले निकल पड़ा,
बेबस है कितना मज़दूर ।
किसी ने अपना बालक खोया,
किसी का उजड़ा है सिन्दूर।
करुण – कथा सुन,मेहनतकश की व्यथा सुन,
पलकें भीगेंगी ज़रूर 😥

Comments

22 responses to “करुण कथा मेहनतकश की”

  1. ना साधन है ना रोटी है,,
    निज घर जाने को मजबूर।
    वाह वाह, यह लेखन प्रतिभा यूँ ही सदैव निखरती रहे। एक उच्चस्तरीय कविता।
    बहुत खूब

  2. Geeta kumari

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏 आपकी प्रेरणादायक समीक्षा से मेरी
    लेखनी को नई दिशा और ऊर्जा मिलती है। बहुत बहुत आभार 🙏

  3. Praduman Amit

    Very nice

    1. Geeta kumari

      Thank you ji🙏

  4. Pratima chaudhary

    बहुत ही उम्दा।।

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद जी 🙏

  5. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    मार्मिक और यथार्थ चित्रण अतिसुंदर रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका भाई जी। आपकी समीक्षा के लिए आभार🙏

  6. Suman Kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद सुमन जी

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका इंद्रा जी🙏🙏

  7. बहुत सुंदर प्रस्तुति

    1. Geeta kumari

      बहुत सारा धन्यवाद जी 🙏

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏

  8. बहुत बढ़िया

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद जी 🙏

  9. Devi Kamla

    उम्दा रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद जी 🙏

  10. Piyush Joshi

    वाह बहुत ही उम्दा

    1. Geeta kumari

      Thank you very much Piyush ji 🙏

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