फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ,
आओ तुम्हे मन-मीत सुनाऊँ।
दिल में है जो प्रीत सुनाऊँ
साँझ हो चली दीप जलाऊँ।
चादर ओढ़े लालिमा की,
साँझ सुहानी जाने लगी है।
दीपक की रौशन लौ से,
एक महक सी आने लगी है।
चली है चंचल सी हवाएँ,
कोयल मीठा राग सुनाए।
सुबह साँझ चले पुरवाई,
प्रीतम तेरी याद है आई।
फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ,
आओ तुम्हे मन-मीत सुनाऊँ।
____✍️गीता
फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ
Comments
9 responses to “फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ”
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साँझ का सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत करने के साथ साथ अति उत्तम कविता की सृष्टि हुई है। स्नेहिल और कोमल रचना। बहुत सुंदर रचना।
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इतनी सुन्दर और लाजवाब समीक्षा हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी, उत्साह प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार
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अतिसुंदर भाव
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सादर धन्यवाद भाई जी 🙏
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बहुत खूब
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हार्दिक आभार चन्द्रा मैम
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कमाल गीता जी
मन को जीता जी
मुकाम हासिल अब
हरेक को सीता जी-
सुंदर समीक्षा और प्रोत्साहन हेतु, बहुत-बहुत धन्यवाद राजीव जी
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फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ,
आओ तुम्हे मन-मीत सुनाऊँ।
दिल में है जो प्रीत सुनाऊँ
साँझ हो चली दीप जलाऊँ।
चादर ओढ़े लालिमा की,
साँझ सुहानी जाने लगी है।फागुन में गीत गाकर
तथा सांझ का मानवाकरण करती हुई पंक्तियां
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