कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे ,
वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था
राजेश’अरमान’
Author: rajesh arman
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कुछ परछाइयाँ
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कभी मन करता है
कभी मन करता है
फिर से दुनिया को
औरों की नज़र से देखूँ
शायद मेरी नज़र में
कोई भ्रान्ति दोष हो
एक बार देखा
जब दुनिया को
दूसरी नज़र से
लगा आँखों पे
कोई चाबुक सा पड़ा
जिसके दर्द से
आज भी कराह रहा हूँ
राजेश’अरमान’ -
गहरे राज़
गहरे राज़ छुपे है अपनी ही साँसों में
लो तो ठंडी छोड़ों तो गर्म -गर्म
राजेश’अरमान’ -
आँखें तो बस देखती रही
आँखें तो बस देखती रही
ज़िंदगी के आवागमन को
राजेश’अरमान’ -
कोई पुल ऐसा भी होता
कोई पुल ऐसा भी होता
जिस पर चलते सिर्फ तुम
राजेश’अरमान’ -
मर गई आत्मा
मर गई आत्मा ,शरीर कहने को ज़िंदा है
पंछी मन का उड़ गया ,आँखों में परिंदा है
राजेश’अरमान’ -
न सूत न
न सूत न कपास
फिर भी बंधी आस
जुलाहे ले के बैठे लट्ठ
कभी तो आएगी कपास
राजेश’अरमान -
चारों और अधर्म
चारों और अधर्म के जंगल
भक्ति हो गई दावानल
राजेश’अरमान’ -
अच्छा हुआ आँखों
अच्छा हुआ आँखों से बह गए आँसूं
जो जिगर में जम जाते तो हादसा होता
राजेश’अरमान’ -
अपनी हर सांस तो
अपनी हर सांस तो बस तेरी चाह में गुजरी
तेरी सारी उम्र जमाने की परवाह में गुजरी
सोचा था कहोगे उदास तुम मेरी खातिर न हो
क्या कहेगा ज़माना ,फिक्र ज़िंदगी की राह में गुजरी
राजेश’अरमान’ -
मेरे लफ्ज़
मेरे लफ्ज़ ग़ुलाम बन गए
तेरे लफ़्ज़ों की सरफ़रोशी से
राजेश’अरमान’ -
कभी बादलों से
कभी बादलों से
कभी बिजलिओं से
बनती है सरगमकलकल बहते पानी
चलती हवाओं से
बनती है सरगमइठलाती घूमती
बेटियां होती झंकार
बनती है सरगमअपनी साँसें भी
जब सुर में हो
बनती है सरगमकुछ यादें भी
होकर मधुर
बनती है सरगमकिसी साज़ का दर्द
खुद सा लगे तब
बनती है सरगमराजेश’अरमान’
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कल रात फिर आँखों में गिरफ्तार हुए
कल रात फिर आँखों में गिरफ्तार हुए
कई ख्वाब नशे में आवारागर्दी करते
राजेश’अरमान ‘ -
कोई वज़ह यूँ भी
कोई वज़ह यूँ भी
निकल आती
तेरे मिलने की
तारों की सजी डोली
लेके आता कहार
मेरे मन के द्वार
मैं मन ही मन में
रूप लेता निहार
काश उस डोली में
कोई ख्वाब सजा होता
आँखों ने लिए थे
संग जिसके सात फेरे
राजेश’अरमान’ -
देख लेता
देख लेता मैं भी तेरे जलवे
गर तेरे जलवे पराये न होते
राजेश’अरमान’ -
की परवरिश जिन
की परवरिश जिन ख़्वाबों की औलाद की तरह
दफ़न कर मुझे फ़र्ज़ निभाया औलाद की तरह
राजेश’अरमान -
गम की फसलें
गम की फसलें सींचता
आँखों की बारिश से
हर ख्वाब ने दम तोडा
अपनी ही गुजारिश से
राजेश’अरमान’ -
किसी ने सूद
किसी ने सूद से भरी पुरवाइयां चुनी
किसी ने दर्द भरी शहनाइयां चुनी
हमें कुछ चुनने का हुनर न आता था
सो गम से लिपटी तन्हाईयाँ चुनी
राजेश’अरमान’ -
चल पड़ा फिर जिस्म
चल पड़ा फिर जिस्म
किसी राह में
मन को छोड़ अकेला
क्यों नहीं चलते
दोनों साथ -साथ
कोई रंजिश नहीं
फिर भी रंजिश
फूल की बगावत
किसी टहनी से
भवरे की शिकायत
किसी फूलों से
मन की तिजारत
किसी जिस्म से
मन रहता है
जिस्म में किसी
मुसाफिर की तरह
जिस्म की हसरत
जिस्म की तरह
नश्वर है
काश रग़ों में
मन दौड़ता
जिस्म की
उमंगों जैसा
किसी जिस्म
किसी मन
की राह अलग न होती
राजेश’अरमान’ -
रात अपना ही
रात अपना ही कोई
किस्सा बन जाता हूँ
दिन के उजाले में कोई
हिस्सा बन जाता हूँ
निकल तो जाता हूँ
बाज़ारों में कहीं
शाम के होते ही
न चलने वाला कोई
सिक्का बन जाता हूँ
राजेश’अरमान’ -
जरूरत के हिसाब से
जरूरत के हिसाब से , खुद से पहचान हुई
कई हिस्से अब भी अजनबी है मेरे अंदर
राजेश’अरमान’ -
उसकी नज़रों की
उसकी नज़रों की तलाशी में
मेरे किरदार बदले से मिले
मैं ढूंढ़ता रहा उसकी आँखों में
चंद कतरे पर जमे से मिलें
राजेश’अरमान’ -
अब मंज़िल
अब मंज़िल मेरे साथ-साथ चलती है
जब से बनाया मंज़िल अपने साये को
राजेश’अरमान’ -
चंद क़दमों में
चंद क़दमों में थक के बैठ गया राही
मंज़िल मुसीबत नहीं जो बैठे- बैठे गले पड़े
राजेश’अरमान’ -
कुछ खास
कुछ खास है वो मेरे वास्ते
दे गए सब बिना मोल-भाव के
राजेश’अरमान’ -
वीराने भी
वीराने भी अब गुफ्तगू करने लगे
नज़र लग गयी इसे भी जमाने की
राजेश’अरमान’ -
चाहा था
चाहा था इक बार फिर अजनबी बन जाना
वो मिलते है हर बार अब अजनबी से
राजेश’अरमान’ -
मेरे जज्बात
मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है
अब फूलों की बातें पहरों में सिसक रही है
अब लहरें समुन्दर की सांसें बन गई है
अब हवाओं में फैल गए है नग्मे दर्द भरे
अब जमाने से खत्म हो गईं यारी अपनी
अब किताबों से गुम हो गए मेरे पन्ने
अब न कोई पिंजरा न कोई आसमान
अब न कोई शाम उदास ,न रातें तन्हा
अब खौफ खुद बन गया है हादसा
अब ख्वाब खुद हो गए है खवाइश
अब अलफ़ाज़ मेरे खुद हो गए बंदी
अब किसी ईमारत में जड जाना चाहता हूँ
मेरे जज्बात अब पत्थर हो गए है
राजेश’अरमान’ -
कुछ तो हैरान
कुछ तो हैरान होगी ज़िंदगी भी
जब हमने अपना मुँह मोड़ लिया
राजेश’अरमान’ -
बचपन की कागज़ की नाव
बचपन की कागज़ की नाव
जो बारिश के पानी में तैरती थी
जो कई बार तैरते तैरते थक जाती थी
और उसे फिर से सीधा कर पानी में छोड़
देते थे और वो फिर तैरने लगती थी
अब वो कागज़ की नाव बड़ी हो गई है
और हम उसके आगे बहुत ही बौने
अब भी कागज़ की नाव जब भी देखता हूँ
लगता हम सचमुच उसके आगे बहुत है छोटे
जो खुशिया वो अकेले हमें दे जाती थी
आज हर ख़ुशी भी मिलकर ,
उस ख़ुशी के सामने बहुत छोटी है
राजेश’अरमान’ -
मंज़िल
मंज़िल की बेताबी खत्म हुई
यूँ कारवां से दिल लगाया हमने
राजेश’अरमान’ -
सरल जीवन
हम बढ़ते रहे
हम समझते रहे
हम पढ़ते गए
हम समझते गए
छोटे थे तो
बड़ा होने का ख्वाब
बड़े हुए तो बचपन लगा प्यारा
कुछ पाया तो खोने का डर
कुछ न था तो नसीब दुश्मन
सयाने हुए तो खिलौने छोड़े
खेलने लगे जज्बातों से
ताउम्र बस ढूँढ़ते रहे
क्या ढूंढ़ना पता नहीं
खुद को कभी खोते रहे
बेवज़ह कभी रोते रहे
यु ही गुजरी ज़िन्दगी
यही है अपना ‘ सरल जीवन ‘
राजेश ‘अरमान’ -

दोस्त
दोस्त
इक अजीब सा रिश्ता
पनपने लगा हम दोनों के बीच
इक दूजे के दर्द को
महसूस सा करने लगे
कुछ खट्टी कुछ मीठी सांसों का
बँटवारा भी रजा से करने लगे
कुछ प्यार से कम था
कुछ प्यार से ऊपर
सवालों के उलझे धागों को
सुलझाने में लगा रहता वो
न अहम न ही कोई ख़ास उम्मीदें
इक खून में भी कहा ऐसा रिश्ता
न कोई शिकवा न कोई रंजिश
मुझे इस दोस्ती पर नाज़ रहा
इस रिश्ते ने बचाया
दर्द की बूंदों से
दर्द की बारिशों से
सारी उम्र देता रहा तस्सलियां,
मेरे ही अंदर का इक और” मैं ”
राजेश’अरमान’ -
जुर्म उनके
जुर्म उनके ,सितम उनके ,खता उनकी
हम तो अब भी खाली हाथ बैठे है
राजेश’अरमान’ -
रहस्य जीवन
रहस्य जीवन
अनेक प्रश्न
निरुत्तर प्रश्नसंभव जीवन
संभव मोक्ष
निरर्थक प्रश्नपुनर्जन्म
संभव जन्म
सार्थक प्रश्नमृत्यु प्रश्न
सत्य प्रश्न
यथार्थ प्रश्नप्रारब्ध चिंतन
सार्वभौमिक चिंतन
अलोकिक प्रश्नजीवन चिंतन
जीवंत प्रश्न
आलोकित प्रश्नराजेश’अरमान’
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जिधर का रुख
जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना
इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेनावक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का
कभी हाथों में तुम एक टूटा आईना रख लेनाज़िंदगी के खेल में कभी शह मिली कभी मात हुई
इन हिसाबों को दबाकर तुम किताबों में रख लेनाअपना सा लगता है कोई आसमा से टूटा हुआ तारा
अपने आगोश में तुम बचपन के टूटे खिलोने रख लेनाज़ंग मैदान की हो या अपने अंदर ,बस बुरी होती है
अपने अंदर ही तुम सुकून की कोई दवा रख लेनाबेसबब बात भी निकल जाती है हलकों से ‘अरमान’
क्या ज़रूरी है हर बात को अपने दिल में रख लेना
राजेश’अरमान’ -
जीतने की ख्वाइश
जीतने की ख्वाइश में कछुए सा चल रहा हूँ,
लेकिन ख्वाइशों का खरगोश सोने के लिए रूकता ही नहीं
राजेश’अरमान’ -
खौफ आईने का
खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है
हर शक्ल आईने के सामने आकर बिखर जाती है
कुछ तो रहस्य छिपा है आईने में शक्ल जो सिहर जाती है
आईने को तोड़ के देखा शक्लों में शक्ल बस नज़र आती हैसच के पीछे का सच, झूठ की ईमारत का खंडहर है
हर झूठ अपना ही बुना कोई आडम्बर है
चुभता आईना अपने ही अंदर का कोई घर हैचिंतन पे लगे है दरवाज़े पर खुलते नहीं
जेहन में आते है सब पर मन मिलते नहीं
सहमे से सच दम तोड़ते पर चीखते नहींखौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है
राजेश’अरमान’
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बंद कर देखों
बंद कर देखों
नयन अपने
खुली रहने दो ,
सब जो नयन नहीं है
नयन से देखने का
अभ्यास अविरल है
स्वयं अन्य इन्द्रियों
की दृष्टि शक्ति
कम की है
अभ्यास एक शास्वत
जीवंत परिणाम है
एक क्रिया है
कभी कण की
उपस्थिति को
स्पर्श किया है
कण की अनुभूति
खुले नयनों से नहीं हो सकती
उस कण को जिस
समय आत्मसात
कर लोगे
वहीँ से होगा प्रारम्भ
तुम्हारा जीवन
राजेश ‘अरमान’ -
अपने साये
अपने साये भी अब अनजान नज़र आते है
बिन बुलाये से मेहमान नज़र आते है
हर शक्स उदास हर रिश्ते अब तो
पत्थरों से ये बेजान नज़र आते है
राजेश’अरमान’ -
तालीम
तालीम कुछ गिनती की यूँ काम आई
बस जाती सांसों को गिनता रह गया
राजेश’अरमान’ -
मुसाफिर अपनी राह
मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है
मृग जाने किस चाह से भटक रहा हैरहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं
दर्पण किस गुनाह से भटक रहा हैकिस सत्य की खोज में मन व्याकुल
कोई फ़कीर दरगाह से भटक रहा हैअदृश्य विलक्षण तरंगे घूमती तेरे अंदर
मानव फिर किस चाह से भटक रहा हैमोह तेरा कवच के चक्रव्यूह में फंसा
मन कवच की दाह से भटक रहा हैराजेश’अरमान’
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सच ने जब
सच ने जब भी तोडा है दम
झूठ ने ही उसे अग्नि दी है
राजेश’अरमान’ -
था वो गुलाब
था वो गुलाब के मानिंद
नज़र बस तेरी काटों पे गड़ी
मैंने भी महसूस किया कैक्टस को
नज़रे जो कभी फूलों पे पड़ी
राजेश’अरमान’ -
जब अपनी ही
जब अपनी ही साँसें एहसान जताने लगे
समझ लो साँसें भी अपनी हो गई है
राजेश’अरमान’ -
कीमत
धर्म की दूकान सदियों से चल रही है ,
कीमत तो चुकाई पर सामान नहीं मिला
राजेश’अरमान’ -
बिखरी जा रही
बिखरी जा रही ज़िंदगी कुछ तेज रफ़्तार से
कोई मोहलत नहीं कुछ भी दुरुस्त करने को
राजेश’अरमान’ -
तेरी बेरुखी
तेरी बेरुखी इस कदर काम कर गई
बेवज़ह वक़्त को बदनाम कर गई
रिश्तों पे पड़ी धूल जब जमने लगी
ख़ामोशी के राज़ सरेआम कर गईराजेश’अरमान’
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काफिला
हर फैसले मेरे तेरे क़दमों में थे
तूने क़दमों का फ़ासला कर लिया
न हो दरम्यां सांसें भी अपनी लेकिन ,
तूने ज़ख्मों का काफिला चुन लिया
राजेश’अरमान’ -
मैं समझ नहीं पाता
मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश में देशद्रोहिता के रहस्य
मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश में असहिष्णुता के मायने
मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश में पलता धर्मो का खेल
मैं समझ नहीं पाता
चार स्तम्भो का घिनौना खेल
मैं समझ नहीं पाता
जनता ने चुना या जनता को चुना
मैं समझ नहीं पाता
पैतरे गोबुल्स के वंशजो के
मैं समझ नहीं पाता
अपने ही देश के आस्तीन के सांपों को
मैं समझ नहीं पाता
अपने देश की शिक्षा प्रणाली को
मैं समझ नहीं पाता
महत्व आज़ादी का
मैं समझ नहीं पाता
लोकतंत्र में छिपे अन्य तंत्र को
मैं समझ पाता
आखिर हो क्या रहा मेरे देश में
मैं समझ नहीं पाता
वर्गों में हो रहे संघर्ष को
मैं समझ नहीं पाता
हम कर क्या रहे है
मैं समझ नहीं पाता
हमारी सोच में दबा क्या है
मैं समझ नहीं पाता
अपने मूल्यों का अवमूल्यन
मैं समझ नहीं पाता
हम किस खोज में है
मैं समझ नहीं पाता
और भी बहुत कुछ
क्या ये असमंजसता
सिर्फ मेरी है ?
मैं समझ नहीं पाता
राजेश’अरमान’