सच से दूर हो रहा इंसा
कोई चढ़ा दे पारा चेहरे पर
राजेश’अरमान’
Author: rajesh arman
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सच से दूर हो रहा इंसा
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जब वो बेवज़ह मुस्कराते है
जब वो बेवज़ह मुस्कराते है
गम लेता है अंगड़ाई चुपके से
राजेश’अरमान” -
आईने को कोई झूठ
आईने को कोई झूठ सीखा दे
आईने को कोई आईना दिखा दे
राजेश’अरमान’ -
काफिलों के साथ साथ चलते रहे
काफिलों के साथ साथ चलते रहे
दुनिया के रंग में बस ढलते रहे
राजेश’अरमान’ -
अपने ही लोग फिर शहर
अपने ही लोग फिर शहर में दहशत क्यूँ
अपनी ही आँखों में जहर सी वहशत क्यूँ
कहीं तो सुनी जाएगी आख़िर फ़रियाद
किसी सजदे को ,किसी दुआ की हसरत क्यूँ
राजेश’अरमान’ -
कुछ अकेले से एहसास
कुछ अकेले से एहसास
फिरते है दरम्या मेरे
कुछ कशिश है उदास
फासलों के घने अँधेरे
दबे कदम चलती साँसें
सहमे कदम आते सबेरे
हलकी बारिश का मौसम
आँखों में धुँआ के फेरे
सोती रात जागती ज़िंदगी
आये शायद नए सवेरे
राजेश’अरमान’ -
खुद को बदलने से जरूरी है
खुद को बदलने से जरूरी है खुद का किरदार बदलना
आदमी दुनिया में पहचाना जाता है किरदारों से
राजेश’अरमान” -
ना खुद को बदल सका
ना खुद को बदल सका ना तेरी निगाहों को
सिलसिला बस चलता रहा खत्म होने के लिए
राजेश’अरमान’ -
मेरी उठती सांसों की तरह
मेरी उठती सांसों की तरह
वो दबे- दबे से एहसास
कैसे उठते चले गएवज़ूद को भेदने लगी
तेरी लफ़्ज़ों की सौगाते
कैसे सुनते चले गएतेरे हँसने से झर रहे फूल
चाहा था चुनना मगर
कैसे बिखरते चले गएवक़्त जो चलता साथ तेरे
न जाने किस मोड़ पर
कैसे ठहरते चले गएतुममें छिपा वर्तमान
और तुम भविष्य की तरह
कैसे छुपते चले गएतेरे चेहरे के बदलते रंग
दिल की कैनवास में
कैसे उतरते चले गए
राजेश’अरमान’ -
तूफां ने लहरों को कब ज़िंदगी दी है
तूफां ने लहरों को कब ज़िंदगी दी है
हवाओं ने चरागों को कब रौशनी दी है
चाँद को तकता है थोड़ी सी रौशनी के लिए ,
सूरज ने कब जुगनुओं को रौशनी दी है
राजेश’अरमान ‘ -
तुमने मेरे बाग़ के फूलों को
तुमने मेरे बाग़ के फूलों को पत्थर कर दिया,
मैं तेरी गली के पत्थरों को फूल करके आया हूँ
जाना मुझे तेरी गली ,आना तुझे मेरे बाग़ों में
इस आने जाने को कितना माकूल करके आया हूँ
राजेश’अरमान’ -
वादियों में गूंजती आवाज़
वादियों में गूंजती आवाज़ लौट सकती है
घटाओं में छुपी बिजलियाँ कौंध सकती है
ना ले मेरी खामोशियों का इम्तेहान इस कदर,
मेरी ख़ामोशी तेरे लफ़्ज़ों को रौंद सकती है
राजेश’अरमान’ -
तुम आसमाँ मैं ज़मीं ही सही
तुम आसमाँ मैं ज़मीं ही सही
तुम हो आंसूं मैं नमीं ही सही
यूँ पलट के देखना तेरा बार बार
कुछ नहीं मेरी कमीं ही सही
राजेश’अरमान ‘ -
शोर नहीं जो दबा दिया जाऊँ
शोर नहीं जो दबा दिया जाऊँ
हर्फ़ नहीं जो मिटा दिया जाऊँ
कोई दीवार पे टंगी तस्वीर नहीं
जब चाहे जिसे हटा दिया जाऊँ
राजेश’अरमान’ -
जो बिकता सरे आम वो ईमान होता है
जो बिकता सरे आम वो ईमान होता है
जो जहाँ को समझे वो नादान होता है
बदलते रंग में ढल गयी सारी दुनिया
जो अधूरा रहे सदा वो ‘अरमान’ होता है
राजेश’अरमान’ -
आ ज़िंदगी तुझे रिश्वत दूँ
आ ज़िंदगी तुझे रिश्वत दूँ
एक नई तुझे तबियत दूँ
गुफ्तगू ये तेरे मेरे बीच की ,
आ नई तुझे शख्शियत दूँ
राजेश’अरमान’ -
मैं रास्ते खुद अपने बना लूँगा
मैं रास्ते खुद अपने बना लूँगा
वक़्त जैसे चलना है अपनी चाल चल
राजेश’अरमान’ -
अब गुनाह में नीयत नहीं देखी जाती
अब गुनाह में नीयत नहीं देखी जाती
अब प्यार में सीरत नहीं देखी जातीसब के अपने फलसफे ,सबके अपने तजुर्बे
अब उम्र के लिहाज़ की इज्जत नहीं देखी जातीधन दौलत का चारों तरफ है डंका अब तो
अब किसी पाक दिल की ज़ीनत नहीं देखी जातीनज़राने तेरे प्यार के अब तक सहेज के बैठा हूँ
नज़रानों में जन्नत होती ,इसकी कीमत नहीं देखी जातीचेहरों को याद रखना मुश्किल ,पहचानना मुश्किल
अब बदलते चेहरों की सूरत नहीं देखी जातीचिकनी चुपड़ी बातें और बातों में छुपी और बातें
अब बातों की दबी अस्लियत नहीं देखी जातीसीधे सीधे भी सीधी ज़िंदगी काट जाते ‘अरमान’
दुनिया की उलटी सीधी फितरत नहीं देखी जातीराजेश’अरमान’
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जुदा हो जाते पिंजरे
जुदा हो जाते पिंजरे से पखेरू
लिख जाते कोई दास्तां अधूरी
राजेश’अरमान’ -
कोई शजर शाख से बैर
कोई शजर शाख से बैर नहीं रखती
कोई शाख पत्तों को गैर नहीं रखती
अपने हौसलों से ही जहाँ मिलता है
कोई दरवाज़े पे किस्मत पैर नहीं रखती
राजेश’अरमान’ -
इतना न पशेमाँ हो
इतना न पशेमाँ हो की मैं पिघल जाऊं
कुछ तो रहने दो पत्थर मेरे अंदर
राजेश’अरमान’ -
दे के वो गिनते रहे
दे के वो गिनते रहे ज़ख्म मेरे
मैं उनकी सादगी पे फ़िदा हो गया
राजेश’अरमान’ -
या रब्ब दुश्मनों को सलामत रखे सदा
या रब्ब दुश्मनों को सलामत रखे सदा
न जाने कब आरज़ू क़त्ल की मचल जाये
राजेश’अरमान’ -
अंधेरों में वो नज़र
अंधेरों में वो नज़र आते है
उजालों में जो ठहर जाते है
चाक रखते है दामन अपना
पर महफ़िलों में संवर जाते है
राजेश’अरमान’ -
अक्स आईने में दिखता
अक्स आईने में दिखता तो जरूर है
हम ही तोहमत लगा जाते है आईने पे
राजेश’अरमान’ -
मसला सिर्फ इतना है
मसला सिर्फ इतना है
वो समझते नहीं मुझे
गर समझते तो इक नया
मसला खड़ा होता
ठीक से नहीं समझते
इस ठीक से समझने की
कोई परिभाषा नहीं है
अंदर से तालमेल की
कोई अभिलाषा नहीं है
उम्र गुजर जाती समझने में
जीने के लिए उम्र
कोई उधार नहीं देता
कुछ लम्हे इक दूजे से
उधार लिए थे
जिसका सूद न तुम चूका पाये
न मैं चूका पाया
बस बढ़ता जा रहा है सूद
काश फासलों में
कुछ तालमेल होता
छोटी छोटी बातों में
जीवन का खेल होता
मसला सिर्फ इतना है
राजेश’अरमान’ -
बारिश की बूंदो की
बारिश की बूंदो की
हल्की हल्की आवाज़
कानो में रस घोलते
जेहन में उतर जाती है
कौंधती बिजलियाँ कुछ
ठक ठक सी दस्तक
देती है मन के कोने में
जिस कोने को बंद दरवाज़ा
बना के रखा है वक़्त ने
दरवाज़ा कभी खुलता तो
कभी फस जाता है चौखट में
हवाएँ भी बारिश में कुछ
अल्हड हो जाती है
चलती है जैसे
बारिश उन्हें जवाँ कर गई
इन ठंडी हवाओं से
लिपट कर सब बंद दरवाज़े
खुल जाते है
प्रकृति की इस छटा
से लिपटने को
राजेश’अरमान’ -
गुथियाँ सुलझाने में
गुथियाँ सुलझाने में
उलझ जाता जीवन
पकड़ के कान
खींचता है जीवन
कभी इस तरफ
कभी उस तरफ
सीधी रेखाएं
खींचता हूँ जीवन की, पर
जा के मिल जाती है ये
हाथ की टेढी रेखाओं से
मेरी रेखाएं दब जाती
उभर के आती बस
हाथ की रेखाएं
जिसे मैंने नहीं खींचा
जिस पर मेरा अंकुश नहीं
एक खींचतान चलती
दोनों रेखाओं में
मैं बच्चो की तरह
पाल रहा हूँ
दोनों रेखाओं को
और लगा रहता हूँ
गुथियाँ सुलझाने में
राजेश अरमान -
एक जानी पहचानी सड़क पर
एक जानी पहचानी सड़क पर
चला जा था मैं बेखबर
तभी कुछ पहचानी सी आवाज़ें सुनाई दी
पुलिस की गाडी की आवाज़ सुनाई दी
देखा सड़क पर पड़ी हुई थी एक लाश
जिसके कातिल को कर रहे थे लोग तलाश
मैं भी लाश के समीप पंहुचा
देखने लगा सब के साथ लाश को
पुलिस ले रही थी लाश के जेबों की तलाशी
निकली कुछ उधार के कागज़ के पुरजे
निकले कुछ बिलों के अदायगी के स्मरणपत्र
बिजली काटने के धमकीपत्र
और न जाने कितने ऐसे पत्र
जो रौंद के रख दे किसी को भी
एक पास खड़ा व्यक्ति बोला
लगता कोई गाडी इसे कुचल गई
देखो इस के शरीर पर निशान पहियों के
मैं भीड़ को चीरता हुआ लाश के करीब पंहुचा
किसी ने कहा ,क्या तुम इसे जानते हो ?
क्या इस लाश को पहचानते हो ?
मैंने कहा हा ,इसे मैं पहचानता हूँ
इसके शरीर पर पड़े पहियों के निशान
आज की महंगाई रुपी गाड़ी के है
ये मेरे देश का आम आदमी है
राजेश’अरमान’ -
खुद से जुदा भी नहीं
खुद से जुदा भी नहीं मुखातिब भी नहीं
खुद को बयां करूँ ऐसा कातिब भी नहीं
गुमगश्ता फिरती है नाशाद रूह जिसकी
फ़िदाई बन भी सकूँ ऐसा जाज़िब भी नहीं
राजेश’अरमान’फ़िदाई= प्रेमी
कातिब= लेखक
गुमगश्ता= भटकता हुआ, खोया हुआ
जाज़िब= मनमोहक, आकर्षक -
तेरी याद आज
तेरी याद आज
बैठी है गुमसुम
शायद थक गई
यादों की भी उम्र होती है
एक उम्र बाद यादें धुँधली
पड़ जाती है लेकिन
तुम्हारी यादों की ताप बढ़
गई है उम्र के साथ
राजेश’अरमान’ -
कुछ खट्टी मीठी छोटी छोटी बातों
कुछ खट्टी मीठी छोटी छोटी बातों
का एक छोटा सा संसार है जिसे
न जाने कितनी सरहदों
कितने धर्मों में बाँट रखा है
बस आती जाती सोच का तमाशा है
जरूरी है तय होना
कौन सी सोच को आना है
कौन सी सोच को जाना है
जाने वाली सोच का विसर्जन
बेहद जरूरी है, जिसमे
मूर्ति भी तुम हो मूर्तिकार भी तुम
राजेश’अरमान’ -
सहमी सी शाम
सहमी सी शाम
रातों के घने साये
काँपती सुबह
दिन वही अजनबी
लोग कहते है की
अब ज़माना बदल गया है
राजेश’अरमान’ -
सजदा करते उम्र गुजर गई
सजदा करते उम्र गुजर गई
मुँह फेरकर दुआ गुजर गई
ज़िंदगी इसी कश्मकश में गुजरी ,
मेरी बंदगी बेवफा बन गुजर गई
राजेश’अरमान’ -
मसखरी भी करती है ज़िंदगी
मसखरी भी करती है ज़िंदगी तब जाना
जब खुद को खुद पे हँसता हुआ पाया
राजेश’अरमान’ -
दुनिया में रहकर
दुनिया में रहकर दुनिया को तकता हूँ
आईने को किसी दुश्मन सा तकता हूँ
बेनूर से मंजर का हक़ लिए फिरता हूँ ,
आँखों से बस ढहते ख्वाबों को तकता हूँ
राजेश’अरमान’ -
कुछ खत रेत पे लिखे
कुछ खत रेत पे लिखे , मैंने तेरे लिए
फिर हवाओं को सदा दी, मैंने तेरे लिएअपने हिस्से की बूंदे तोगिरा दी मैंने
कुछ आँखों में छुपा दी ,मैंने तेरे लिएतेरे खत को जब तरसने लगी आँखें
कुछ खत जलाये थे ,मैंने तेरे लिएवस्ल के वो दिन जब अँधेरे से लगे
इक दीप जलाया था मैंने तेरे लिएबाग़ के फूल जब टूट गए टहनी से
किसी तितली को उड़ाया,मैंने तेरे लिएरात चाँद को देखा तारों से घिरे हुए
अपने सूरज को जगाया ,मैंने तेरे लिएराजेश’अरमान’
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नज़राना क्या दूँ
नज़राना क्या दूँ ,दोस्त तेरी दोस्ती का
हक़ अदा कैसे करूँ ,दोस्त तेरी दोस्ती का
कहने को अल्फ़ाज़ कुछ इस तरह है मौजूँ
न छूटे कभी साथ ,दोस्त तेरी दोस्ती का
राजेश’अरमान’ -
कितने पास आ गए है
कितने पास आ गए है उजालों में छिपे अँधेरे
कभी खुद को कभी अपनी परछाई को देखता हूँ
राजेश’अरमान’
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अपने नहीं औरों के
अपने नहीं औरों के कन्धों पे नज़र रहती है
बोझ कभी न कभी जिन्हे मेरा उठाना है
राजेश ‘अरमान’ -
रिश्तें आसमा में उड़ती
रिश्तें आसमा में उड़ती पतंग की तरह है
जिसे लूटने के लिए दुनिया खड़ी है
राजेश’अरमान’ -
वो इतना घबरा गए है
वो इतना घबरा गए है वफ़ा के नाम पर
बेवफाई के नमूनो की तस्वीर सजा रहे है
राजेश’अरमान’ -
तज़ुर्बे जलने के
तज़ुर्बे जलने के बटोरे उम्र भर
जानता हूँ बेकार नहीं जायेगा
राजेश’अरमान’ -
वो झूठ भी बोलते है
वो झूठ भी बोलते है इस सफाई से
सच भी उनके सामने झूठ बन जाता है
राजेश’अरमान’ -
कुछ गुजरने जैसी ही
कुछ गुजरने जैसी ही गुजर जाती है
किसी तमगे की मोहताज नहीं होती ज़िंदगी
राजेश’अरमान’ -
उनके फेके पत्थर
उनके फेके पत्थर अब तक उठा रहा हूँ
न जाने फिर कब उनके काम आ जाएँ
राजेश’अरमान’ -
मेरी तस्वीर से लेकर
मेरी तस्वीर से लेकर तक़दीर सब गर तय है
मेरे हिस्सें में पाप -पुण्य का खाता क्यूँ ?
राजेश’अरमान’ -
हाथ की लकीरें ही
हाथ की लकीरें ही गर सुख-दुःख है
जीवन फिर खेल कहाँ ,बस इक तमाशा है
राजेश’अरमान’ -
गर मैं तुम्हे फिर
गर मैं तुम्हे फिर पाने के लिए यहाँ हूँ
ऐ खुदा फिर जुदा होने की ये सजा कैसी
राजेश’अरमान’ -
गर खुदा होना
गर खुदा होना ही मंज़िल है
हाथों में गलत नक़्शा क्यों ?
राजेश’अरमान’