जीवन सिर्फ जीवकोपार्जन के लिए किया प्रयास नहीं है जी सभी रहे है लेकिन जीने का एहसास नहीं है सदियाँ बीती हवाओं की भी इस ज़माने की हवा लग गई है दीपक हौसलों के बस […]

इक बार मेरी सिसकती कलम ने कोरे कागज़ पर लकीरें खीच दी मैं सारी उम्र उसे जीवन रेखा ही समझता रह गया इक बार मेरा हाथ उन लकीरों में पड़ गया लगा सारी हाथ की […]

फासलों का मंजर देख कुछ याद आया किसी अजनबी शहर सा बस ख्याल आया कोई शोर नहीं किया आईने ने उस वक़्त जब देख चेहरा अपने कोई सवाल आया परदे ही परदे में रह गए […]

गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती गर न तेरे शिकवे […]

वो जब हमसफ़र थे तब भी अच्छे लगते थे आज दूर से हाथ हिलाते हुए भी अच्छे लगते है क़ुर्बतों की दास्ताँ भी फ़क़त चंद किस्सों का जमावड़ा है साथ रहें तो भी अच्छे ,न […]

इतनी गुजरी है ज़िंदगी , आगे भी गुजर जाएगी किसकी ठहरी है ज़िंदगी , जो मेरी ठहर जाएगी बस दौड़ते पकड़ते फिरे, चुनते फिरे गिरे हुए लम्हे तेरे हाथों में रखे लम्हों पर क्या तेरी […]

वो बारिश का मौसम वो गरम गरम जलेबी वो धुआं छोड़ती चाय छतों से टपकता पानी छातों का साफ़ कर घर से निकलना पानी से छप छप करते खेलना जान बुछकर भीगना ओटली पर कतार […]

  हर बार गिरे ,फिर सम्भले सिलसिला ये बरक़रार रखते है हम वो गुलिस्ता है जो फूलों से नहीं काटों से प्यार रखते है तिरी समुन्दर सी आँखों में झाँककर यूँ तो डूबे दीवाने कई […]

हर मौसम में बदल जाती है , अपने ही अंदर की अपनी तस्वीर राज़ ये गहरा है जिसे कोई समझ पाया नहीं गम की चाह करता हूँ सदा ताकि पा सकूँ दो पल की ख़ुशी […]

इन बहकते बादलों को कोई राह तो दिखलाये बरसना था खेतों पे ,किसान की आँखों में बरस रही है टकटकी फिर भी लगी आसमान की तरफ उम्मीद से बारिशों की बूंदों को खेतों में देखने […]

आयतों की खवाइश में इक मज़ार बन के रह गया दुनिया के कारखाने का बस औज़ार बन के रह गया न किसी मंदिर ,न मस्जिद न हरम के क़ाबील हूँ फूल बनना चाहा था ,बस […]

मंज़िलें कुछ इस कदर हमसे जुदा हो गई है ये हमारे वास्ते तो बस ख़ुदा हो गई है अच्छे दिन आने वाले है बस सुनते रहे या तो नई मुश्किलों की इब्तेदा हो गई है […]

जाने क्यूँ वो छोड़ के मेरा साथ गया तन्हाइयों के पुर्ज़े दे के मेरे हाथ गया हमें तो सुकूँ था वक़्त के सूखों में भी बेवज़ह दे के आँखों को वो बरसात गया सब कुछ […]

मुक्त आकाश में हवाओं ने कब किसी का रास्ता रोका है हम ही तेज हवाओं के भय से रास्ते बदल लेते है रास्तों ने कब किसे रोका है हम ही थक कर रूक जाते है […]

तेज भागती दौड़ती ज़िंदगी कुछ थक सा गया है इंसान अंदर से कुछ -कुछ एक धावक की भी दौड़ने की एक सीमा होती है जहा पहुंचकर वो विजेता होता है पर इस ज़िंदगी की दौड़ […]

अपने शब्दों को कभी सच की , लिबास न ओढ़ा सका घुमते रहे मेरे शब्द झूठ के चिधडे ओढे , फटे फटे से कपड़ों में कितने बेहया से लगते है शब्द ,जब ढंग की लिबास […]

कैनवास मेरा और तस्वीर तेरी रंग मेरा पर रंगों की आराईश तेरी अश्कों के समुन्दर आँखों के मेरे , आँखों में तैरती कश्तियाँ तेरी इस घर पे रखी इक शै सही मैं , इस घर […]

इक असीर सी जीस्त का पनाहगार हूँ मैं जो कभी न मुक्कमल हुआ वो असफ़ार हूँ मैं इख्लास का लिबास कहाँ मेरे नसीब में अपने ही इत्लाफ़ का बस इक क़रार हूँ मैं क़ल्ब कसूर […]

आखरी उड़ान होगी किसे था गुमाँ आसमां में फैलेगा बस धुआं ही धुआं माना वक़्त के आगे बेबस रात दिन कैसे लगी आसमां पे हवाओं की बद्दुआ कितनी आँखें भीगी , हुई जब दर्द की […]

आश्ना कब तेरे शहर में कोई मिलता है जिसको देखो वो अजनबी सा मिलता है हमने देखी है इस जहाँ में ऐसी दरियादिली बिन मांगे ही झोली में गम हज़ार मिलता है तिरी जुस्तजू जन्नत […]

पंछी इक देखा पिंजरे को कुतरता हुआ आज़ादी एक जुनूँ होती है एहसास हुआ बादल ही देते है बारिश और बिज़ली भी इस दुनिया के भी दो रूप का एहसास हुआ दरख्तों की जुबां भी […]

हर जुनूँ की कोई वज़ह होती है हर वज़ह ज़ूनू की सजा होती है हर शख्स सजा-याफ्ता है यहाँ , फर्क सालो का, पर सजा होती है रिन्दों के लिए मैखाने उजाले होते है जिनके […]

‘ उलझे हुए धागे भी सुलझाने से सुलझ जाते है उलझे रिश्तें सुलझाने से और उलझ जाते है / रिश्तों की नाज़ुकी को क़द्र की पनाह दे दो वरना रिश्तें किसी उलझे धागे में उलझ […]

कुछ इस तरह से इक शाम गुजारी है अपने हिस्से के गम से की वफादारी है कुछ टुकड़ो में बाँट के रख दिया ग़मों को अपने साथ हमने की इस तरह फौजदारी है राजेश’अरमान’

पुनर्जन्म क्या मिथ्या है ??? या यथार्थ समझ से परे ? हर नई सुबह भी तो होती है पुरानी सुबह का पुनर्जन्म अपने ही अंदर होता है एक नया जन्म आकार वहीँ स्वरुप वहीँ पर […]

मुट्ठी में अपने आकाश, भरने का इरादा रखता हूँ तारों को हथेलिओं में ,सजाने का इरादा रखता हूँ किसी गिरी हुई इमारत की बस इक ईट सही , बुलंद इमारत फिर भी ,बनाने का इरादा […]