Category: हिन्दी-उर्दू कविता

  • desh

    12705464_194397890918271_7576599827298806037_n

    ब्रह्मा-ऋषि-मुनि-चरक का तो ये देश हो सकता नहीं ,,

    क्यूँ बताते हो डॉक्टर पेट में बेटी है बेटा  नहीं ..!!

  • फिरास़त

    ये तो फिरास़त है मेरी जो विरासत ए इश्क कर दी है तेरे नाम,
    वरना जाबिरों को काबिल ए वफा समझता ही कौन है ,

  • ढहती दीवारें

    तब, जबकि कल ;
    बहुत छोटी थी ‘मैं’
    कहा करती थी ‘माँ’
    ——- ऐसा मत करो !
    ——- वैसा मत करो !!
    : वरना लोग क्या कहेंगे ?

    शनै:–शनै: —– ‘मैं’ ; ‘ये लोग’ और ‘इनके’ ‘कहने का डर’
    यौवन की दहलीज़ तक, साथ—साथ चले आए ……………..
    “घर से निकलने” और “सुरक्षित लौट आने तक”
    पता नहीं ‘कौन लोग’ , क्या – क्या कह जाते ?

    माँ ! एक आशंका से भरी रहती …………….
    सीली लकड़ी—सी सुलगती ………. धुंधयाती ॰

    ‘लोग क्या कहेंगे !”
    किसी निर्लज़्ज सवाल की तरह
    टांक दिया गया : मेरे समूचे वजूद पर
    खिलने को आतुर , एक बेताब पीढ़ी पर
    —– माँ , सुनती रही ……
    —– लोग , कहते रहे ……
    —– मैं , तरसती रही …….

    वक्त बदला और दृश्य भी
    लेकिन, वही रहीं परिस्थितियाँ
    पति की जिद और
    ससुराल की मर्यादाओं में बिंधी
    मैं, सजी—संवरी ……. सहमी—सहमी
    : ‘लोग’ और ‘उनके कहने का डर’ आत्मसात करती चली गई ॰

    मगर, सुन मेरी बच्ची !
    पहली बार कुछ कहा है ; तूने
    : लोगों के कहने से पहले
    पहली बार उछाला है : शाश्वत सवाल
    —– “कि कौन हैं ‘वे’ लोग” ?
    —– “क्या कहते रहते हैं, आखिर” ??

    —- ‘आखिर क्यूँ !
    किसी के कहने—सुनने पर
    मैं , अपने जीवन का आधार बुनूँ’ ?

    — “कब तक ? आखिर कब तक, माँ !”
    — “मैं, गूँगी बनी रहूँ ??”
    “मैंने नहीं कहा कभी कुछ !
    क्या इसीलिए सबकी सुनूँ !!”

    सच कहा तूने, मेरी बच्ची !
    —- “लोगों का कहना केवल मन का भय है” —-
    न, ‘वे’ लोग हैं कहीं और न कहते हैं ‘कुछ’ कभी॰

    सुन,———–
    तू !…………….
    अपने तरीके से जी …….
    मेरी भी दुआ है, यही ……

    जिस आग में “मैं”
    ता —- उम्र पिघली ………
    तू, उस ताप से महफ़ूज रह कर
    : अपने जीने की राह खुद तय कर

    “ हम देखेंगे कि ; ………….
    लोग, आखिर क्या कहेंगे ? “॰
    *******______________*******

  • उम्मीद

    गम के फसाने को तेरी खुशियों ने लूटा , तेरी हर दीद की उम्मीद ने अखियों को लूटा ,
    उजाले की हर किरन को तूनें कनखियों से लूटा,तुझे पाने की हर कोशिश को तेरी सखियों ने लूटा ,

  • 2liner

    दो सिसकियाँ हीं कभी काफ़ी हैं दिल हल्का करने को,
    दो साँसे हीं कभी काफ़ी हैं ज़िंदगी जी लेनो को

  • “तलब” #2Liner-68

    ღღ__तुमसे मिलने की तलब, कुछ इस तरह लगी है “साहब”;
    .
    जिस तरह से कोई मयकश, मयखाने की तलाश करता है !!…..‪#‎अक्स

    .

    12662579_232776543730244_2573282794866884622_n

  • मेरी ज़िन्दगी मुझे ऐसा मुकाम दे दे!

     

    मेरी ज़िन्दगी मुझे ऐसा मुकाम दे दे!
    हरवक्त़ धड़कनों में सनम का नाम दे दे!
    मुझको फिकर नहीं है किसी दौर-ए-सितम का,
    मेरे लबों पर मयक़शी का जाम दे दे!

    Composed By #महादेव

  • रोशनी कुछ और है

    Raja Ji

    कुछ गरीबों का आशना

    फिर जला है शायद

    राजा जी के महल में

    आज रोशनी कुछ और है

                       ……यूई

  • चाहत

    कभी कभी दिख भी जाया करो हुज़ूर,डर रहता है कहीं देखने की चाहत ही ना खत्म हो जायें |

  • “शिकायत” #2Liner-67

    ღღ__बहुत खामोश रहते हो, तुम भी आज-कल “साहब”‘;
    .
    ख़ुदा से है शिकायत या, खुदी से नाराज़ रहते हो !!…..‪#‎अक्स‬
    .
    tumblr_la4p1mSh9K1qzur0ko1_500
  • ज़माना बदल गया

    वो ज़माना गया जब एक
    नारी अपने हक़ के लिए लड़ा करती थी।
    वो ज़माना गया जब एक नारी
    अपनी जगह बनाने के लिए मरा करती थी।

    आज की नारी इतनी सक्षम है
    कि गलत को गलत कह सके
    आज की नारी इतनी सक्षम है
    कि गलत को सही कर सके ।

    उसके खिलाफ खड़े होने वालों को
    करारा जवाब दे सके
    हर चीज़ मे दोषी मानने वालों को
    तिनके की तरह उछाल सके।

    प्यार करो तो
    प्यार देने में वो पीछे नहीं
    इज़्जत दो तो
    इज़्जत देने मे वो पीछे नही।

    अात्मनिर्भर है आज की नारी
    उसे अपनी खुद्दारी है बहुत प्यारी
    चुप नहीं बैठेगी अबला नहीं है
    ईंट का जवाब पत्थर से देगी
    सबला वही है।

    फर्ज़ निभाना जानती है तो
    पलट वार भी कर सकती है
    सेवा करना जानती है तो
    भस्म भी कर सकती है।

    उसे दुनिया में कमज़ोर
    न समझ ऐ इंसान
    दुनिया की है यह हकीकत
    उसकी है अपनी अलग पहचान ।

  • वो माँ है

    वो माँ है
    आँखों में छुपी हमारी हर ख़ुशी ,
    हर मुस्कराहट का राज़ है तो वो माँ है,
    गम हो की दुख़,दर्द ही क्यों न हो दिल मे ,
    उस दर्द में छुपे हर सवाल का जवाब है तो वो माँ है,
    दुखाये दिल जब ये दुनिया कही हर मुकाम पे,
    संभाल मुझे समझाने वाली वो है तो वो अपनी माँ है,
    आंसू आए जहाँ चहेरे पर जब कभी ,
    हाथ आँचल संभाले आये वो साथ मेरी माँ है,
    ये मुस्कान, ये हँसी, चहेरे पे जो हरदम दिखे,दुनिया की तब्दील मुश्किलों के बावजूद उस मुस्कराहट का राज़ है तो वो माँ है,
    माँ शब्द है समुन्दर से गहरा ,
    ममता का वो सागर है,जिसके बिना शायद ये कायनात अधूरा है,
    कैसे लिख दे कोई कवी बन अपनी माँ की ममता की कहानी,
    शायद इसलिए हर माँ की कविता का प्रेम लिखता कोई हम कवी तो सच कहता हु की लिखा हर शब्द अपनी माँ के लिए अधूरा है।
    मेरी ये कविता हर माँ को समर्पित,?
    अपनी माँ कविता लोढ़ा के जन्मदिन पर।
    कवि-निशित लोढ़ा

  • ज़िन्दगी में रिश्ते भी अक्सर आते जाते हैं

    ज़िन्दगी में रिश्ते भी अक्सर आते जाते हैं!
    चाहो जिसे भी उम्रभर वे लोग भूल जाते हैं!
    जब हालात के तूफान से गुजरता है कोई,
    उसका दर्द देखकर तो बस लोग मुस्कराते हैं!

    Composed By #महादेव

  • “सिल-सिला” #2Liner-66…….

    ღღ__मोहब्बत थी तुझसे ही, तुझसे ही हर गिला रहा;
    .
    उम्र-ए-शब-ए-रोज़ का, बस यही सिल-सिला रहा !!……‪#‎अक्स

    .

    12728980_1968305463395258_211164361366505506_n

  • “मैं”-१

    वक्त की कलम से जिन्दगी के हँसी पल लिखने जा रहा हूँ मैं,
    गमों की परछाई पर खुशियों के साये सा छाने जा रहा हूँ मैं,
    गर समझ हो तो आ जाना मेरे साथ , वरना अपना ही साथ आजमाने जा रहा हूँ मैं,

  • “मोहब्बत” #2Liner-65….

    ღღ__बिछड़कर देर तक तुझसे, उस दिन मैं सोंचता रहा “साहब”;
    .
    मोहब्बत गर ना हुई होती तो, मेरा क्या हुआ होता !!……‪#‎अक्स‬
    .
    12512262_942354439204932_6008907185555412476_n
  • ये ख्वाइशें

    रेत के महलों की तरह ,हरदम ढहती है ये ख्वाइशें
    फिर भी हर पल क्यों सजती सवरती है ये ख्वाइशें

    उम्मीदे इन्ही ज़िंदा रखती सांसों में रचती -बसती
    पलती-बढ़ती सब चुपचाप सहती है ये ख्वाइशें

    एक खवाइश पूरी होते ही अपनी कोख से
    दे जाती जनम कोख में पलती है ये ख्वाइशें

    इन्हे पूरा होने की आस में रहते बैचेनी की गोद में
    जाने -अनजाने दर्द से आलिंगन चाहती है ये ख्वाइशें

    कभी होगा खत्म इन ख्वाइशों का अनवरत क्रम
    जिंदगी का है अंत पर अमर होती है ये ख्वाइशें

    हर खवाइश बंधी आशा की सुनहरी जंजीरों से
    जिसे तोड़ने की खवाइश भी ,जन्म देती चंद नई ये ख्वाइशें

    कौन कहता है होती नहीं इन ख्वाइशों की जुबान
    हर पल टूटती न जाने ,क्या चीखती है ये ख्वाइशें

    शायद इन ख्वाइशों और धड़कनों का नहीं कोई रिश्ता
    मर जाता है इंसान, पर मरती नहीं है ये ख्वाइशें

    लगता इन ख्वाइशों का सच अपनी समझ से परे ‘अरमान’
    शायद यही ज़िंदगी है कुछ उम्मीदें और अनंत है ये ख्वाइशें

  • हम उन लम्हों

    हम उन लम्हों की याद को
    जेहन में यु संजोये बैठे है
    रहकर भी दूर जैसे
    आँखों में बसता है कोई
    उन लम्हों की सांसें हमें
    हरदम चलती नज़र आती है
    जो अहसास कराती है अपने
    और लम्हो के जीवित होने का
    लगता इन लम्हो की धड़कन
    रूक जाने से शायद
    रुक जाएगी मेरी धड़कन भी
    सोचता हूँ क्या बात है खास
    उन बीत गए लम्हो में
    क्यों इन्हे सजोने की इच्छा
    इस कदर रखता हूँ मैं
    आखिर क्यों उन लम्हो को
    कफ़न ओढ़ा दफ़न नहीं कर पाता
    शायद कोई ठोस कारण है इसका
    शायद इसे दफ़न नहीं कर पाता इसलिए
    क्योकि ये मेरे जीवित होने का
    जीवंत भ्रम पालने के लिए
    लगता एक अनिवार्य दस्तावेज बन गया है
    राजेश ‘अरमान’२३/०७/१९८९

  • हालात फिर बदले

    कल भी हम थे ,ये जमीं थी
    पर वो पाँव नहीं थे
    ढूंढ सकते जो तेरे क़दमों के निशाँ

    हालात फिर बदले

    इन पाँव को
    मिली कोई मंज़िल
    जो थी तेरे
    पलकों की महफ़िल

    हालात फिर बदले

    मेरे पाँव ,तुम्हारे पाँव
    अब हमारे हो गए
    लगने लगे सब बेगाने
    तुम इतने हमें प्यारे हो गए

    हालात फिर बदले

    तुम लौट गए सफर से
    मिटाकर उन क़दमों के निशां
    जिस राह पर कदम थे मेरे
    नहीं थे तुंम्हारे क़दमों के निशां

    हालात फिर बदले

    हम तुम और मैं हो गए
    जमीं रही वही मगर
    हम भी रहे ,सफर भी रहा
    पर रहा न कोई हमसफ़र

    हालात फिर बदले

    मैं हूँ मेरे पाँव है
    तुम हो तुम्हारे पाँव है
    पर तले उसके
    वो साँझा जमीं न रही

  • छोड़ आया थी

    छोड़ आया थी अपनी तन्हाई को भींड में
    लुत्फ़ अब ले रहां हूँ तन्हाई की भीड़ में
    राजेश ‘अरमान’

  • अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे जाने और सावन के आने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरी चुप और मौसम के गुनगुनाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मेरे माज़ी और मेरे मुस्कराने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे मिलने और मेरे ज़ख्म खाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे गेसू और घटाओं के छाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    तेरे तीर और कहीं चल जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    मिल के और ग़ुम हो जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    बंद आँखें और ख्वाब टूट जाने का

    अजीब इत्तफ़ाक़ है
    ‘अरमान ‘ तेरे और तेरे अनजाने का

    राजेश ‘अरमान’

  • चलो चुप लफ्जों

    चलो चुप लफ्जों को मिल के बाँट लेते है
    चल निकले लफ्जों को मिटटी से पाट देते है

    वो तेरा कहना मुझे मौसम की तरह
    चल तीर को किसी शाख पे गाड़ देते है

    वो तेरा मिलना किसी अजनबी जैसे
    चल इसे पहली मुलाक़ात का नाम देते है

    वो तेरा बारहा जाना फिर रूठ के मुझसे
    चल इसे तेरे क़दमों की ख़ता मान लेते है

    वो हर बात पे कहना तुम वैसे न रहे ‘अरमान’
    चल इसे वक़्त के साथ चलना जान लेते है

  • न माथे पे

    न माथे पे कोई बिंदिया
    न हाथों में कोई कंगन
    न होठों पे कोई लाली
    न पोशाक में तेरी खुश्बू
    न जुल्फें सवरी हुई
    न माथे पे कोई टीका
    न आँखों में काजल
    न पैरों में है पायल
    न हिना की महक
    आ तुझे प्यार करूँ
    ज़िंदगी तू सज के तो आ

    राजेश ‘अरमान’ १२/११/१९८९

  • मैं संघर्ष कर रहा हूँ

    मैं संघर्ष कर रहा हूँ
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ

    एक ‘मैं’ हूँ अपने ही जैसा एक ‘मैं’ और भी है
    इन दोनों ‘मैं’ में तालमेल बिलकुल भी नहीं
    फिर भी मैं रखता हूँ दोनों को अपने साथ
    अपने जिस्म में ,रूह की गहराईयों में
    कभी एक ‘मैं ‘ मेरा दर्द होता है
    तो दूसरा ‘मैं’ दवा बन जाता है
    कभी एक ‘मैं’ मेरा दोस्त होता है
    तो दूसरा ‘मैं ‘ दुश्मन बन जाता है
    इन दोनों ‘मैं’ में से बस एक ही
    समय एक ही ‘मैं ‘मेरे अस्तित्व
    की परछाई बन दुनिया को दिखता है
    मेरे अंदर दो ‘मैं’ रहते है
    अस्तित्व केवल एक ‘मैं’ का
    आज तक मैं दुसरे ‘ मैं’ को उसका
    हक़ नहीं दिला पाया हूँ
    क्योकि दोनों में से एक ही ‘मैं’
    को मिली है नागरिकता
    बस अपराधबोध पनपता है
    एक उस दुसरे ‘मैं’ के
    नाजायज होने का
    अब भी उस दूसरे ‘मैं ‘के लिए
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..
    मैं संघर्ष कर रहा हूँ ..

    राजेश’अरमान’

  • गर वाबस्ता हो

    गर वाबस्ता हो जाता रूहे-अहसास से जमाना
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर वफ़ा करने की आदत होती जहाँ में
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    गर न तेरे शिकवे होते न शिकायत होती
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    अंधे ख्वाबों का न सिलसिला गर होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    जज़्बे की तौहीन न दिल तार तार होता
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    तेरी कलम की रोशनाई सूख जाती ‘अरमान’ गर
    न कोई शायरी होती न कोई ग़ज़ल होती
    राजेश’अरमान’ 12/04/1991

  • बिखरे बिखरे ख्वाब

    बिखरे बिखरे ख्वाब
    सुलगते सुलगते आंसूं
    सीने में तूफ़ान
    दिल में बस कशिश
    काफिले यादों के लम्बे
    कोई शै मुकम्मल नहीं
    तनहा तनहा सफर
    लम्बी लम्बी रातें
    न वफ़ा का इल्म
    न जफ़ा का तजुर्बा
    बस एक गहरी खाई सी जीस्त
    उस पर भी सुकु के ,
    पंख होते तो उड़ते फिरते
    खुली हवा में भी ,
    पिंजरे का बंदपन
    सांसें भी लेते है ,
    खुद पे अहसान जताकर
    लगता है सृष्टि रचते वक़्त ही ,
    ग़ज़ल भी रच दी गई थी
    राजेश ‘अरमान’ १४/०२/१९९०

  • वर्तमान ही सत्य

    वर्तमान ही सत्य बाकी सब मिथ्या है.
    भूत तो बिन बाती तेल का दीया है
    मत सोच में डुबो, तुझे किसी से क्या मिला
    कर हिसाब तूने किसी को क्या दिया है

    राजेश ‘अरमान’

  • फरियाद बन के

    फरियाद बन के निकली मेरी वफ़ा तेरी गली में
    कौन सुनता मेरे दिल की सदा तेरी गली में

    यूँ तो बस आवाज़ हूँ एक बुतखाने की
    कौन बख्सेगा यूँ मेरी खता तेरी गली में

    दरो-दीवार से लिपटी हुई एक तस्वीर सही
    कौन मुड़ के देखेगा यहाँ तेरी गली में

    बात दरियां की करों या समुन्दर की
    डूब के देखेगा मुझे कौन भला तेरी गली में

    मेरी आहट भी मुझे नागवारा गुजरी ‘अरमान’
    मेरे सनाटों को सुनेगा कौन भला तेरी गली में
    राजेश ‘अरमान’

  • ग़मे-ए-मुदाम

    ग़मे-ए-मुदाम से इस कदर परेशां न हो ,
    सुना है हर गम के पंख भी होते है
    राजेश’अरमान’

  • तेरे साथ गुज़ारे

    तेरे साथ गुज़ारे चंद लम्हों की
    जागीर की बस मिल्कियत रखता हूँ
    ये अलग बात है खुद को
    सबसे अमीर अब भी समझता हूँ
    राजेश’अरमान’

  • वो समझते रहे ताउम्र

    वो समझते रहे ताउम्र, बस एक किस्सा मुझे
    हम वहम् में रहे वो समझते है ,अपना हिस्सा मुझे

    फरेब खाने की तो तालीम अपनी बड़ी पुरानी है
    हम फूलों की तरह मिलते, वो दिखाते काटों का गुस्सा मुझे

    राजेश’अरमान’

  • तूफां मन के

    तूफां मन के अंदर हो या समुन्दर में
    लहरें कुछ न कुछ खींच के ले ही जाती है
    राजेश ‘अरमान’

  • मैंने खुद ही

    मैंने खुद ही
    खींची लकीरें
    अपने दरम्या

    मैंने खुद ही
    बना दिये
    इतने धर्म

    मैंने खुद ही
    सीखा दिया
    भूर्ण को छल कपट

    मैंने खुद ही
    गिरा दिए
    अपने संस्कार

    मैंने खुद ही
    मिटा दिए
    अपने हर्ष को

    मैंने खुद ही
    बना लिए
    खाली मकान

    मैंने खुद ही
    जला दिए
    अपने सपनो को

    मैंने खुद ही
    ओढ़ लिए
    कई चेहरे

    मैंने खुद ही
    सब किया है
    अब तक

    मैंने खुद ही
    रचा है
    अतृप्त रंगमच

    मैंने खुद ही
    सजाये है
    सूनी सेज

    मैंने खुद ही
    बहाये है
    आँखों से नीर

    मैंने खुद ही
    नहीं माना
    खुदको दोषी

    क्या हो अंत
    इस खुद का
    जो है अनंत

    जिजीविषा के
    इस मायावी
    अंतर्मन को

    किसी की नहीं
    दस्तक चाहिए, बस ,
    अपने खुद की

    राजेश’अरमान’

  • बंदगी तेरी

    बंदगी तेरी यूँ मेरे काम आ गई
    अब किसी दुआ की जुस्तजू न रही

    राजेश’अरमान’

New Report

Close