Category: हिन्दी-उर्दू कविता

  • मन की चेतना

    मन की चेतना
    आत्मा की वेदना
    सत्य का भेदना
    अधीर प्रश्न
    बुझे उत्तर
    बिलखते प्रश्नचिन्ह
    निष्कर्ष कुंठित
    आज का आदमी

    राजेश ‘अरमान’

  • मुलाकात

    जिनके आने के ख्वाब में हम पलकों को बिछाये बैठे हैं ,
    वो किसी और के ख्वाबों को पलकों पर सजायें बैठे हैं
    चलों ये गुस्ताखी भी हम माफ करें , गुफ्त़गू के लिये मुलाकात करें ,
    पर कब तक यूँ ही बात करें , दिन रात वफा की फरियाद करें ,
    आओ हम नई शुरूआत करें ख्वाबों में ही क्यूँ ना मुलाकात करें,

  • “पतझड़”

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    मासूम निगाहें पलकों पर आश सजोयें अब भी राह ताकती होंगी,
    सबके खो जाने के गम में छुप – छुप  कर  दर्द  बाँटती  होंगी,

    वो यादें बड़ी सुनहरी है उनको मैं बार बार दोहराता हूँ,
    उनको हर वक्त याद कर कर ख्वाबों में गुम हो जाता हूँ,

    हर वक्त इसी का इन्तजार कि कोई तो उंगली थामेगा,कोई फिर नन्हें पांवो को  सही  राह दिखलायेगा,
    हर गलती पर पीछे मुड़ता की फिर कोई डाँट लगायेगा, फिर कोई बाहों में भर गालों को सहलायेगा,

    वक्त की इन बंदिशों पर विजय पाना है मुझे,यादों के कटोरे से वो हंसी पल चुराना है मुझे,
    एक बार फिर उसी बचपन में जाना है मुझे,पतझड़ में भी बहार सा मौसम लाना है मुझे,

    गुजरते वक्त नें जब ली थी फिर से अंगड़ायी,चंद सिक्कों की कीमत फिर मुझे थी याद आयीं,
    बस गुजारिश है मेरी रब से यहीं कि फ़कत में कुछ वक्त लिख दे,

    सारी दौलत के बदौलत मेरा वो हंसी वक्त लिख दे,ख्वाबों के संसार में मेरा भी इक शहर लिख दे,
    गर नहीं पूरी हो रही है  मेरी छोटी सी दुआ तो मेरी झोली में रंजिशों का  कहर  लिख दे ,
    …सारी जिन्दगानी की बदौलत मुझे एक नयीं सहर लिख दे

  • ” बच्चे और सपने “

    सपनों में बच्चे देखना
    सुखद हो सकता है ;
    लेकिन ; बच्चों में
    सपने देखना आपकी भूल है

    जैसे; सपने…… सिर्फ़ सपने
    बच्चे : साकार नहीं करते
    वैसे ही; बच्चों में सपने
    साकार करना फिजूल है.

    हाँ ! आप ऐसा करिए;
    बच्चों में सपने रोपिए
    शिक्षा और संस्कार
    कदापि न थोपिए .

    आपके सपने —————
    चाहे जितने रंगीन हों
    आपकी विफलता की कहानी हैं

    बच्चों की उडान
    उनकी सफलता की निशानी हैं.

    आप बच्चों को उड़ने दीजिए
    खुले आकाश में——–
    तेज हवा और तीखी धूप के बीच
    बिन्दास–बेखौफ़– बेतहाशा

    बस; डोर उतनी ही खींचिऐ
    कि; पतंग……..पथ से भटके नहीं
    पेडों की फुनगियों— बिजली की तारों
    और भवन— छज्जों पर अटके नहीं.

    *******——–*********———*****

  • लबों पर जब कोई आता है अक्सर

    लबों पर जब कोई आता है अक्सर!
    रगों में कोई उतर जाता है अक्सर!
    उम्र बीत जाती है जिसकी यादों में,
    गली से तेरी मुकर जाता है अक्सर!

    Composed By #महादेव

  • “हद” #2Liner-64…..

    ღღ__कभी फुरसत मिले जो ‘साहब’, तो पूरी ये अहद कर दो;
    .
    कुछ इस हद तक मुझे चाहो, कि बस “हद” कर दो !!…..#अक्स
    .
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  • आँखों में रखा

    आँखों  में रखा बुलंदिओं का जोश है
     यहाँ हर इंसा खुद में   मदहोश है

    वहां से निकल तो आया था जहाँ शोर था
    कैसे निकलू जो अपने ही अंदर सरफ़रोश है

    कौन सी दुनिया को कोसते हो जी भर के
    कौन नहीं  भला यहाँ अहसान-फरामोश है

    न हवाओं न फ़िज़ाओं का कोई कसूर यहाँ
    हर शख्स अपनी ही दौड़ का सोता खरगोश है

                                   राजेश’अरमान’

  • aankhon mein rakha

    aankhon mein rakha bulandion ka josh hai
     yahan har insaa khud mein  madhosh hai

    wahan se nikal to aaya tha jahan shor tha
     kaise nikaloon jo apne hi ander sarfarosh hai

    kaun si duniya ko koste  ho jee bhar ke
    kaun nahin bhala yahan ahsaan-faramosh hai

    na hawaon na fizaon ka koi kasoor yahan
    har shaksha apni hi daud ka sota khargosh hai

                      rajesh’armaan’

  • patjhar

    !!!! SAGAR KE DIL SE !!!!

    patjhar main bhi kuch patte
    shakho par reh jaate hai

    bhure waqt main bhi kuch dost
    saath nibha jaate hai

    maut se sangharsh aur jeewan se pare
    ek naya jeewan shuru karne main

    yahi eham bhumika nibhate hai

    (ek khayal aaya bas likhe diya)

  • baitaab

    !!!! SAGAR KE DIL SE !!!!

    phir ek baar sagar shant hai

    kisi khaas lehar ka intzaar hai

    baitha hun baahain failaaye kinaare par

    dil uss se aalingan karne ko baitaab hai

    @@ SAGAR @@
    01/03/16 :: 3:00 PM

  • बोल ; मेरी मछली !

    जब अंधे;आपस में मिल बैठकर ,
    : संध्या बांचते हैं
    कुत्ते : पत्तल चाटते हैं………..

    यही तो है ; हमारी व्यवस्था !
    कि; अंतिम पंक्ति का अंतिम व्यक्ति
    डरा–सहमा जड रह जाता है
    उसे धकिया कर ; हर बार
    एक नया पात्र सामने आता है .

    गुलाम मानसिकता ———-
    नपुंसक व्यवस्था के सम्मुख
    दोहरी हो के दण्डवत होती है
    कतार स्तब्ध है ; याचकों की
    ———————–सहमी है
    : खाई और चौडी होती है.

    व्यवस्था : हमेंशा जूते में दाल बांटती है
    नेतृत्व की ‘ चरणदास ‘ पीढ़ी छांटती है.

    आजादी के रथ को ———-
    मौकापरस्त कुत्ते हांक रहे हैं
    थके घोडे : अस्तबलों में
    ——————– हांफ रहे हैं.

    और ; हम है कि ! सपनों के भारत की
    लोकतंत्र से संवैधानिक दूरी नाप रहे हैं. ……………………

    ” वे “, दांत और दुम के
    सामूहिक प्रयोग में पारंगत हैं
    : कुत्ते हैं ;
    “हम”;अधिकारों से अनभिज्ञ
    अपने–आप से हत् हैं
    : अंधे हैं.

    तभी तो कहा गया है ; कि, —
    जब अंधे मिल—बैठ कर
    संध्या बांचते हैं
    : कुत्ते पत्तल चाटते हैं ……

    ……कुत्ते ही पत्तल चाटते हैं .

    ***********——–*********

  • Maa

    Ummar ho gayi
    Par wo nahi dekh paya kabhi

    Jo bachpan main dekha payar
    Maa ki aankhon main

    Wo ahsaas aaj bhi mujhe
    Skoon deta hai

    Aaj bhi maa ko mere paasa
    Hone ka saboot deta hai

    @@ SAGAR KE DII SE @@

  • लगा है इन्सान खुद को बनाने में

    बनाया है खुदा ने इन्सान को
    दुनिया बनाने के लिए
    मगर देखिए क्या हो रहा है दुनिया में
    लगा है इन्सान खुद को बनाने में!

  • हासिल कुछ भी

    हासिल कुछ भी नहीं नफरतों से
    क्यों खेलते हो फिर जज्बातों से
    जब इंसा ही इंसा का दुश्मन हो
    क्या मिलेगा किसी को इबादतों से
                        राजेश’अरमान’

  • कमबख्त दिल

    कमबख्त दिल

    कमबख्त दिल सब समझता है
         खुद  दिल से दूरियां रखते है
    वज़ूद  सामने होता है लेकिन
          खुद को बहरूपिया रखते है
                    राजेश’अरमान’

  • “ज़मानत” #2Liner-63

    ღღ___बहुत सुना था ऐ इश्क़, तेरे बारे में लोगों से;
    .
    देख सांसों की ज़मानत पे, मैं तुझसे मिलने आया हूँ !!…..‪#‎अक्स‬
    .
  • सत्ता और सुन्दरी

    सत्ता और सुन्दरी

    सत्ता और सुन्दरी
    एक ही सिक्के के दो पहलू
    दोनों का चरित्र : दलबदलू

    इक- दूजे के बिना अधूरे
    दोनों प्रतिबध्द परस्पर पूरे
    आदमी के लिए ; ———–
    दोनों ही निहायत जरुरी
    दोनों का वशीकरण
    ————— जी — हुजूरी.

    दोनों के मजे हैं ; अपनी तई
    जुड़ी हैं दोनों से ही———–
    ………………बदनामियाँ कई.

    सत्ता का पावर और
    सुन्दरी का आफर
    ललचाई निगाहों से तौलता है
    उसका ईमान हर बार डोलता है
    उसे पाने की लालच में
    आदमी! हमेशा ————
    “कुत्ते की भाषा” बोलता है.

    सत्ता और सुन्दरी दोनों का
    नशा है
    :आदमी ; किससे बचा है ?

    सत्ता का नशा ———-
    सिर चढकर बोलता है
    अदना नेता ————-
    कीर्तिमान तोडता है;

    सुन्दरी ——–शर्माती है
    पहलू ग….र्मा….ती है
    आदमी को; “आम ” से
    : “खास” ; बनाती है.

    सत्ता और सुन्दरी
    दोनों में अनूठा आकर्षण है
    दोनों ही ” चिकने घडे हैं ”
    शून्य प्रतिशत घर्षण है.

    ये दोनों ही जब ; सड़कों पर आते हैं
    देखनेवाले “भय ” अथवा “भाव” से
    ————— जड़ होकर रह जाते हैं .

    सत्ता है तो;
    कई सुन्दरियाँ
    होंगी आसपास
    और ; सुन्दरी ही तो
    सत्ता के गलियारों तक
    आपको ले जाने का
    करती है ; सफल प्रयास .

    सत्ता और सुन्दरी की
    मात्र नामराशियाँ ही
    एक नहीं हैं ———– (कुम्भ राशि)
    सदियों से दोनों ही धाराएं
    समानान्तर बही हैं .

    इनका नशा————-
    जब परवान चढता है
    हर कोई सलाम करता है
    और; जब उतरता है, दोस्त !
    : आदमी ; बुरीतरह बिखरताहै

    सत्ता और सुन्दरी
    दबाब की परिस्थितियों में
    बेहतर काम करते हैं ;
    निरंकुश हो जायें अगर
    तो; जीना हराम करते हैं .

    सत्ता को चाहिए …………..
    जोड ———– तोड में माहिर
    : बाहुबलि ————-शातिर,
    और; सुन्दरी को पैसा प्यारा है
    यदि शक्तिभी है ; आपके पास
    तो; उसका सर्वस्य हमारा है.

    सत्ता के समन्दर में नहाकर : सुन्दरी
    और “नमकीन” हो जाती है;
    जब तक ” जवान है——–जापान है ”
    परिपक्व होते ही—“चीन” हो जाती है.

    सत्ता और सुन्दरी
    दोनों ही प्रतिबिम्ब हैं
    ” नंगी व्यवस्था के—–
    अश्लील प्रश्नचिन्ह हैं
    लोकतंत्र है ; आ….ई….ना
    —– बात समझ में आई ना !

    शास्त्रोंने;सत्ताऔ सुन्दरीको
    “प्रथम सेवक” — कहा है
    मगर; सदियों का इतिहास
    उठाकर देख लो ; आप !
    इनके लिए हर युग में निरन्तर
    : बेहिसाब लहू बहा है…….
    *********————********

  • HINDU MUSLIM ROTI

    मुस्लमान   बनके   बांटो   या   हिन्दू   होके   बांटो ,,

    पर  दोस्त ,

    केवल   रोटी   के   ही   टुकड़े   हर   घर   में   बांटो ……!!
    ………………………………………….~~**चंद्रहास**~~

  • आंसू तेरी भी रही होगी कोई कहानी कही

    आंसू तेरी भी रही होगी कोई कहानी कही

    आंसू तेरी भी रही होगी कोई कहानी कही

    सोचता हु कभी-कभी में, की ऐ आंसू ,
    तेरी भी तो रही होगी कोई कहानी कही ,

    दुःख में सुख में आ जाता है तू हर घड़ी ,
    फिर जर्रूर तेरी भी रही होगी कोई कहानी सही ,

    ये मन उदास हुआ जब कभी ,
    तो क्यों आ जाता है मुख पे तू आंसू वही,
    शायद तेरी भी रही होगी अधूरी कहानी कही ,

    लगता है मुझे कभी-कभी ,
    की तुझे छोड़ न गया हो अकेला इस जहान में कोई कही,
    तभी तो रह गयी होगी तेरी वो कहानी अधूरी वही ,

    फिर सोचता है ये मन जब कभी ,
    कि ख़ुशी के पल में भी आँखो से है झलकता है तू हर कही,
    शायद ज़िन्दगी में मुस्कान तेरे रही होगी हर सदी ,
    फिर क्यों रही होगी वो कहानी अधूरी तेरी भी कही ,

    आशा की ज़िन्दगी जीता है तू अनकही ,
    आंसू तू गम-ख़ुशी के हर घूट पीता है जब कभी ,
    तभी तो तेरी भी रही होगी कोई कहानी सही,

    अलाह,भगवन,ईसा मसीहा को याद किया भी होगा तूने जब कभी ,
    देखा तुझे हर चहेरे पे मैंने अंतर मन से वही,
    बस सोचा इस दिल में यही,
    की आंसू तेरी भी रही होगी कोई कहानी सही,
    शायद होगी तेरी भी कोई कहानी कही.

    निशित लोढ़ा

  • हिन्दुस्तान की ब्यथा

    भारत!
    अब न भारद्वाज कि
    भारत रही
    न अकबर की
    हिन्दुस्तान
    एक कलियुग का
    सुदामा
    हाथों मे दिया लिए हुए
    हिन्दुस्तान
    ढूढ़ रहा था
    कचरे कि ढेर मे
    उसकी उंगलीयाँ
    थिरक रही थि
    और भारत!
    बिलखतेहुए बच्चो को
    फुटपाथ पर छोडकर
    सर पे कम्प्युटर के
    बोझ लिए हुवे
    भाग रही थि
    चाँद कि तरफ
    किसे फिकर है
    भारत की
    इस सुदामा को?
    और यह दीन दुखि:
    सुदामा!
    हसरत भरि नजरो से
    दानीयों को ढूढ़ रहा था
    यह दिन कि लाली
    इस दीन का कर्मक्षेत्र था
    उसके हाथो का कटोरा ही
    हिन्दुस्तान की
    ब्यथा थी

    हरि पौडेल

  • फुटपाथ

    सिकुड़कर फटि हुई कपड़ो मे
    गठरीनुमा होता जारहा है वह
    मायुस सा
    आँखो मे प्रचुर गम्भीरता लिए हुवे
    जैसे मजबूर मुक पशु हो
    पडा है फुटपाथ मे
    इसे देख अपने बदन के सुटको
    उतार फेकनेको जी चाहता है
    खामोस आँखो से वह
    बहुत कुछ कहरहा है, इस जमाने को
    टुकुर टुकुर हसरत भरी नजरो से
    देखता है
    कोइ राहगीर
    चबाये जो सेव को
    गटर मे फेके जुठा पत्तल
    जो चाटा उसने
    डैनिग टेबुल मे सजे पकवानोको देख
    उल्टी करनेको जी चाहता है
    क्यों एक इन्सा इन्सानको
    करती है इतनी जिल्लत
    कौनआया है कुछ लेकर यहा
    और लेकर क्या हम जाएंगे
    किसने बनाई इस भेद भावको
    कौन आकर सम्हालेगा अब
    फस गया मै इस किस दुभिदा मे
    कैसे सम्हालु मेरे मन और मस्तिष्कको
    अब तो सर को दिवार मे फोडनेको जी चाहता है

    हरि पौडेल

  • न हुई सुबह न कभी रात इस दिल ए शहर में

     

    न  हुई  सुबह  न  कभी  रात इस दिल ए शहर में

    कितने   ही   सूरज   उगे   कितने   ही  ढलते  रहे

  • TANNHAAII

    baithaa huaa thaa main
    niruttar sa hokarr–
    ki,kisi ki aawaaz aayee
    puchha — to kahaa
    main hu ” Tanhaai”—aapka sath
    nibhaane ko aayee
    shunytaa si hotho pe
    khillkhilaahat ne dhakk jamaaii
    hasi aayee— kahaa Maine
    tum to khudd ho tannhaaii
    tanhaa ho– phirr sath kaise(?)
    aaj tkk tanhaaii ne —–
    kahaa kisi ki saath nibhaii
    Jo khudd ho akela,
    kaise lgaa sktaa wo melaa
    muskuraahatt lekar hotho pe,
    tannhaai ne kahaa bde pyarr se
    kaun saath nibhat hai yahaa pe
    tanhaa aata aur tanhaa jata hai yahaa se—–
    samjhe———!!!!!!!
    arrthaat……
    mere alaawe koi dujaa sathi nhi
    sbhi drishya hai Maya ke– sachcha koi sangee nhi
    yhi ke liye pyarr hai– yhi ke liye muhabbt
    yhi ke liye chaahat aur daulatt
    chhorr karr yhi pe sabbkuchh—
    yaad aatii “tannhaaii”
    mere sath aagmann yahaa pe—
    mere saath hi bidaaii
    janmm se marann takk to——
    tanhaaii ne hi saath nibhaaii….I

    —Ranjit Tiwari ” Munna”

  • संघर्ष ; शेष है !

    संघर्ष ; शेष है !

    किसी नदी का
    सिर्फ़ नदी होना ही पर्याप्त नहीं होता ॰
    किसी भी नदी का जीवन बहुत लंबा नहीं होता
    बेशक; लंबा हो सकता है : रास्ता ,
    न, ही ………………..
    शेष रह जाता है
    नदी का जीवटता भरा अस्तित्व
    कहीं किसी महासागर में
    आत्म—सात हो जाने के पश्चात ॰

    इसीलिए; ज़रूरी है——–
    हर नदी के लिए
    —- बनाए रखे अपनी पहचान
    —- जिजीविषा के प्रतिमान
    —- जीवन के मधुर गान ॰
    कुछ कर गुजरे ………..
    महाकाया में विलय से पहिले ॰

    यही यथार्थ पिरोये
    उसकी लहर—लहर ढोये
    उद्धेग…… अल्हड्पन…… तीव्रता
    दिशा—हीनता का बोध
    चुभते—नुकीले पत्थरों के मध्य
    जीवन—संगीत का शोध
    किसी आवश्यकता के मद्दे—नज़र
    बंजर सींचने की क्षमता ढहते किनारों का प्रतिरोध
    उसकी पहचान बने
    नदी ………… मात्र एक नदी न रहे !
    : सृष्टि का जीवन—गान बने ॰

    तभी; किसी नदी की
    उद्गम से विश्राम तक
    तय—शुदा शौर्य—गाथा की सार्थकता होगी ॰
    संघर्ष ——— हर पल जारी है
    नदी ………………
    : कोई युद्धरत अनमनी सदी
    :अनुपम त्रिपाठी
    *********_______********
    ‪#‎anupamtripathi‬ ‪#‎anupamtripathiK‬

  • जलते है नाजुक पांव मेरे

    जलते है नाजुक पांव मेरे

    जलते है नाजुक पांव मेरे
    वक्त की गरम रेत पर
    अब के बस किसी काफ़िले में
    कोई अपना मिल जाये

  • जिनके आने से पहले

    जिनके आने से पहले, मौसम का गुमाँ हो जाता था
    आज वो खुद ही हो गए, इक मौसम की तरह
    राजेश’अरमान’

  • इम्तिहाँ लेते है वो

    इम्तिहाँ लेते है वो कुछ इस अंदाज़ से
    आता हुआ जवाब भी हम भूल जाते है
    राजेश’अरमान’

  • अब भी मेरा नाम

    अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
    उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

    ये चादर जरा आहिस्ते से संभल कर ही हटाना
    ये फूलों से नहीं ,चुभते काटों से सजी मजार है

    वो नाम भी मेरा लेते है और कसम भी खाते है
    हम तो पहलू में उसके मिटने को कब से तैयार है

    यक़ीनन उसके इरादों पे कोई शक नहीं मुझे
    भरे ज़ख्मों को भी हिला देंगे मुझे ऐतबार है

    अभी तो इब्तिदा है तेरे सितम की ‘अरमान’
    तेरे सहने को पड़े कतार में अभी गम हज़ार है

    अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
    उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

    राजेश’अरमान’ २१/०४/2012

  • सब कुछ है जहाँ में

    सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है
    ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है

    आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की
    और हमें सच बोलते आईनों की इल्लत से बैर है

    देखिये उस तरफ फिर कोई मकां जल रहा है
    शायद वहीँ अपने अपने हिस्से की आदमियत का शोर है

    हर्फ़ निकलते ही लब से, बन जाते है अफ़साने कई
    कौन देखेगा यहाँ किस अफ़साने से मिटा कोई दौर है

    चल कोई ऐसी फिज़ा इफ़्फ़त भरी तलाश करें ‘अरमान’
    या तो पहले ही से फैला फिज़ाओं में हर तरफ जहर है

    राजेश ‘अरमान’
    इफ़्फ़त= शुद्धता, पवित्रता
    इल्लत= दोष, बुरी आदत,

  • आराईश अपने अंदर

    आराईश अपने अंदर की तो हम अब खो चुके है
    तलाश आलम की करते फिरते रहने को नासबूर है

    परस्तिश बन्दे की हो या फिर ख़ुदा की हो
    बस कुछ न कुछ मांगने का अजीब सा दस्तूर ह

    तिरा हर फैसला निकलता है सिर पे पत्थर की तरह
    कोई मेरे हक़ में भी हो ,जिसे मैं भी कहूँ मंजूर है

    या के इन परिंदो के आसमां में भी कोई पिंजरे न सजा दे
    ताक के इनको उड़ता है कोई ,जो अपने पंख से मजबूर है

    इस तस्सली के दरिया में कब तक रहे ‘अरमान’
    मेरे हिस्से का भी बना कोई समुन्दर कहीं जरूर है

    राजेश’अरमान’

  • मेरी खिड़की से

    मेरी खिड़की से
    कोई ख्वाब निकल
    फिर खो गया
    इन हवाओं में
    अब मैं खिड़की
    बंद रखने लगा
    अब ख्वाब आते है
    भागते भी नहीं
    बस इक घुटन सी
    फैलती है उनके
    साथ रहने से

    हवा सी चीज़ है
    ये ख़्वाब भी
    बस महसूस होते है
    इन्हे मुठी में
    जकड नहीं सकते
    ख्वाब हवाओं में ही
    रहने को बने है
    अब फिर मैंने
    खिड़की खोल दी है
    राजेश’अरमान’

  • आए न रास किश्तों के क़त्ल

    आए न रास किश्तों के क़त्ल ,क़त्ल हो तो एक बार हो
    मेरे क़ातिल दुआ मेरी ,तेरे खंजर की न खत्म कभी धार हो

    देते है खुद को धोखा ,औरो के फरेब से क्या बच पाएंगे वो
    अपने गिरेबां में झाकने से जो गुरेज करें,वो खुद से क्या शर्मशार हो

    चल के बैठे फिर उस महफ़िल पे क्यों गैरत के खिलाफ
    उस महफ़िल कभी न जाना जहाँ तेरे वज़ूद की मजार हो

    तिनके तिनके से बिखर जाते है न जाने क्यों ये नशेमन
    किसी नशेमन का इन आंधिओं से इस कदर न प्यार हो

    आ लेके चल खाक अपने सफर की निशानी समझ ‘अरमान’
    ना जाने किस मोड़ पे आके , यही खाक तेरी ग़मगुसार हो

    राजेश ‘अरमान’

  • अनंत की खोज

    अनंत की खोज

    व्याकुल सा कण कण
    मन चंचल अपार चिंतन
    जिजीविषा मृतप्राय
    अपने होने का अभिप्राय
    एक खोज अनंत की
    निष्कर्ष मरीचिका
    एक खोज मोक्ष की
    निष्कर्ष अज्ञात
    एक खोज सृष्टि की
    निष्कर्ष मौन
    मोक्ष किसका
    निष्कर्ष शून्यता का
    राजेश’अरमान’

  • वो इतना ही कह सका

    वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
    जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

    बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से
    जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे

    कौन समझा है इन हवाओं के रुख को यहाँ
    इख्तियार नहीं है इन हवाओं के आक़िबत पे

    हर्फ़ निकले लबों से ,ज्यों जां निकलती है
    जब तेरी बेरुखी को सजाया था अपनी आदत पे

    लो फिर छेड़ दी दास्ताने-हिज़्र तुमने ‘अरमान’
    क्या हो जाता है हासिल तुझे खुद की उक़ूबत पे

    वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे
    जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे

    राजेश ‘अरमान’
    उक़ूबत= दंड, सजा, उत्पीड़न, यातना
    आक़िबत= अन्त, परिणाम, भविष्य
    निस्बत= सम्बन्ध, स्मोह, सम्बन्ध लगाना,

  • मेरा बचपन

    मेरा बचपन

    दोस्त बचपन के
    याद बहुत आते है
    जब बिछड़ जाते है

    कहां बयां हो पाते है
    जज्बात लफ़्जों में
    अधूरे ही रह जाते है
    मुकम्मल होने की हसरत में

    शरारतें, मस्ती जिनसे होती थी मुकम्मल जिंदगी
    छूट गयी सब बचपन के साथ
    याद बहुत आता है मुझे
    मेरा बचपन

  • दर्द के चरागों को बुझने का

    दर्द के चरागों को बुझने का

    दर्द के चरागों को बुझने का कोई बसेरा दे दो
    ग़ुम हुए लोगों को कोई इक नया चेहरा दे दो

    इन सुर्ख आँखों का कसूर तुम्हारा हिस्सा है
    इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो

    न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर
    अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो

    छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो
    एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो

    निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई
    हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पहरा दे दो

    चीखें सुनकर भी वो खामोश से बैठे है
    काश मुझे साथी कोई बहरा दे दो

    समुन्दर न मिला कोई बात नहीं
    दिल बहलाने को कोई सेहरा दे दो

    हर तरफ बदलने का गर्म बाजार ‘अरमान’
    ले के पुराना कोई नया गम ठहरा दे दो
    राजेश ‘अरमान’

  • दर्द के चरागों को

    दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो
    ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो

    इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है
    इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो

    न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर
    अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो

    छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो
    एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो

    निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई
    हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पर्दा दे दो

    हर तरफ बदलने का गर्म है बाजार ‘अरमान’
    ले के पुराना मुझे कोई नया गम दे दो
    राजेश ‘अरमान’

  • है तो इंसा ही हम

    है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है,
    गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है

    गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे
    पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है

    यूँ तो रखते है हम भी बेइंतेहा पाक नज़र
    पर वज़ूद खाक है ,किसी मस्जिद की चौखट नहीं है

    सरफ़रोश हो भी जाते गर गमजदा न होते
    पर तुझ पे मिटना भी सरफ़रोशी से कम नहीं है

    गर्दिश-ऐ -मुदाम से हम हो गए इतने आज़र्दाह
    आब-ए-आईना हूँ ,पर अपनी ही सूरत नहीं है

    हमने ढोये है जिनके इलज़ाम अपने सिर पर
    अब उनके किस्सों में मेरा नाम तक नहीं है

    कल जो गुजरी वो रात बहुत लम्बी थी
    बात तन्हाई की है , एक रात की नहीं है

    अबद से टूटे कई शीशे ज़माने के पत्थरों से
    हम खुद हो गए पत्थर अब कोई शीशा नहीं है

    ले के बैठे रहे ताउम्र वसीयत में वफादारी ‘अरमान’
    लोग कहते के, ये इस ज़माने का आदमी नहीं है

    राजेश’अरमान’
    अबद=अनन्तकाल
    आब-ए-आईना= दर्पण की चमक
    आज़र्दाह= उदास, दु:खित, खीजा हुआ, व्याकुल,बेचैन

  • मेरे अस्तित्व

    मेरे अस्तित्व
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    कई जाल मकड़ी के
    भेदना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरे सत्य
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    असत्य के पंछी
    उड़ाना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरे मन
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    अहंकार के पशु
    भगाना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरे कामना
    के इर्दगिर्द
    बैठे है
    भाग्य के दानव
    हटाना असंभव
    मगर प्रयास अनवरत

    मेरी आत्मा
    के इर्दगिर्द
    बैठा हूँ
    मैं स्वयं
    निहारना संभव
    पर प्रयास अतृप्त

    राजेश’अरमान’

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