Category: हिन्दी-उर्दू कविता

  • अनुभूति से ओतप्रोत

    अनुभूति से ओतप्रोत
    जीवन चलता है

    जैसे कोई लहर
    जैसे कोई झोँका
    जैसे कोई मौसम
    बस अनुभूति
    ही तो है
    अनुभूति से परे
    अपने भीतर का
    अपने मन का
    अपने अंतर्द्वंद का
    कोई नाता होता है
    किन्तु बिखरा बिखरा
    किन्तु टूटा टूटा
    इस टूटे टूटे को
    जोड़ना जोड़ना होगा
    पंछी को खुले आकाश
    पे उड़ने के लिए छोड़ना होगा
    कहीं पिंजरे में
    रहकर कोई पंछी
    आकाश को नाप सकता है
    नापना आकाश का
    उतना अनिवार्य नहीं
    जितना अपने को नापना
    लहर का अपना
    स्वभाव होता है
    हिलोरे मारना
    महज एक क्रिया नहीं
    एक जीवन्ता है
    उसके और प्रकृति
    के मध्य का सम्बन्ध
    क्या कोई सम्बन्ध
    इस शरीर का प्रकृति से
    स्थापित किया है
    इस शरीर के
    तत्वों को आलोकित किया है
    शब्द मौन
    पर ये मौन
    अपराधबोध से ग्रस्त
    कभी इस मौन
    की गूँज से
    हो जाओं न
    व्यथित असीमित
    स्पर्श स्वयं का
    कर दे भयभीत

    अनुभूति से ओतप्रोत
    जीवन चलता है

    राजेश’अरमान’

  • तुम एक परिणाम हो

    तुम एक परिणाम हो
    तुम क्रिया नहीं हो
    सृष्टि एक क्रिया
    है जो रची गयी है
    रचने की क्रिया
    एक अलोकिक सत्य है
    प्रकृति ,पानी .वायु ,अग्नि
    सब परिणाम है
    बस तुम्हारी तरह
    तुम भयभीत क्यों हो ?
    परिणाम के पश्चात
    कुछ नहीं होता
    न भय ,न प्रश्न
    सृष्टि जब -जब
    रची जाएगी
    तब-तब तुम
    उसके परिणाम होगे
    क्योकि?
    तुम एक परिणाम हो

    राजेश’अरमान’

  • गैरों से क्या करें

    गैरों से क्या करें शिकायत
    अपनों से ही मिली तिज़ारत
    रूसवाइयां तेरी साथ लेकर
    कर लेंगे इस जहाँ से रुखसत
    राजेश ‘अरमान’

  • सहारे बदल गए

    हम भी है तुम भी हो ,पर ये सहारे बदल गए
    लहरें तो वही है मगर ये किनारे बदल गए

    लोग पत्थर के बन गए है , ,दिल हमारे है आईने
    हम तो अब भी वही मगर ये हमारे बदल गए

    कल तक महका करती थी बगियाँ ये फूलों से ,
    माली तो वहीँ मगर चमन के नज़ारे बदल गए

    इस ईमारत की बुनियाद तो अब भी है बुलंद
    बस रहने वालों के हाथों के इशारे बदल गए

    यादों के दिए आखिर कब तक जलाये ‘अरमान’
    अफ़सोस तेरे बदलने का यूँ तो सारे बदल गए

    राजेश’अरमान’
    २७/०७/१९९०

  • गर निकल पड़े जो सफर को

    गर निकल पड़े जो सफर को
    देख मुड़ के न फिर डगर को

    आएँगे यूँ तो कई विघ्न
    पड़ेंगे देखने कई दुर्दिन
    हौसला हो साथ अगर
    हो जायेंगे ये छिन-भिन्न

    तट से जो भटक गई हो,
    तो दो मोड़ उस लहर को

    गर निकल पड़े ———

    गर काली रात हो सामने
    बढ़ाओ हाथ अंधेरों को धामने
    देंगे फिर घुटने टेक
    दो पल के ये है पाहुने

    गर डस ले सर्प कालरूपी
    उगल डालो उस जहर को

    गर निकल पड़े ——–

    गर फस जाएँ तूफा में कस्ती
    लगने लगे मौत जीवन से सस्ती
    अगर ठान लो जूझने की ,
    फिर इस तूफा की क्या है हस्ती

    पा लोगे अपने किनारे
    कर परास्त इस भवर को

    गर निकल पड़े ——

    क्यों हो ढूँढ़ते उत्तम अवसर
    होता आया है यही अक्सर
    जिसने किया इंतज़ार इसका
    प्रयास उसका वहीँ गया ठहर

    गर हो प्रतिकूल समय तो
    बदल डालो उस पहर को

    गर निकल पड़े जो सफर को
    देख मुड़ के न फिर डगर को

    राजेश’अरमान’
    २७/०७/१९९०

  • निकला ढूंढने

    निकला ढूंढने
    अपने दुश्मन को
    कोई मिला नहीं
    टटोला जो अपने
    मन को
    पहचान गया
    अपने दुश्मन को
    राजेश ‘अरमान’

  • तुम महज एक तस्वीर हो

    तुम महज एक तस्वीर हो

    मैं जानता हूँ कि,
    तुम महज इक तस्वीर हो
    ओर उससे आगे कुछ भी नहीं
    मगर दिल ये कहता है
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    सुना था तस्वीरें बोला नहीं करती
    पर तुम क्यों बोलती हो
    क्यों मेरे निहारने से तुम्हारी
    तस्वीर का रंग सूर्ख हो जाता है
    क्यों कन्खिओं से देखते
    तस्वीर का रुख बदल जाता है
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों मेरा आँगन भरा रहता है फूलों से
    जो तेरे हसने से झरते है
    जबकि मैं जानता हूँ
    मेरे आँगन में
    कोई पौधा नहीं लगा है
    किसी भी फूल का
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों तुम्हारी बिखरी जुल्फें
    ललाट को चूमती हुई
    पूरे चेहरे को स्पर्श करती है
    एहसास कराती किसी घटाओं का
    घिर आये बादलों का
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों कानो में घोलती माधुर्य रस
    तुम्हारी चूडियों की खनखन
    बिखर जाते असंख्य प्रसून
    तेरे अधरों के प्रस्फ़ुट कम्पन se
    ज्योति को परिभाषित करती
    तेरे माथे की बिंदिया
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    कविता हो तुम मेरी कल्पना की
    या फिर हो मेरे होठों की ग़ज़ल
    कपोलों पर छवि शशि की ,
    जैसे झील में खिला हो कँवल
    क्यों देख इस कंचनकाया को
    हो जाती है साँसें प्रबल
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों मदहोश कर देती
    तेरी चारूं देह की भीनी सुगंध
    क्यों देखने से लगता तुझे
    पतझड़ भी ,मदमाया मौसम
    कब तक रखें कोई
    अपने चंचल मन में संयम
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    क्यों देती है तेरी अधखुली पलके
    सुधापान का मौन निमंतरण
    क्यों न करदे तुझ पे
    अपना सारा
    जीवन अर्पण
    तुम महज इक तस्वीर नहीं हो

    तुम महज एक तस्वीर हो
    इसका भी मुझे एहसास है
    तुम महज एक तस्वीर नहीं हो
    इसका भी मुझे विश्वास है

    मैं जानता हूँ तुम नहीं ,
    मेरे हाथों की लकीर हो
    फिर भी कैसे कर लूँ यकीं

    तुम महज एक तस्वीर हो

    तुम महज एक तस्वीर हो

  • मेरे ज़ख्मों का खाता

    मेरे ज़ख्मों का खाता इक दिन नीलाम हो गया
    दुश्मनों को मिला न हिसाब और इन्तेक़ाम हो गया

    वाबस्ता थे जिन चेहरों से ,जो थे मेरे रात दिन
    उनके चेहरों का रंग सारे शहर में सरे-आम हो गया

    कब तलक छुपती है किसी चेहरे पे पड़ी नक़ाब
    मेरे क़ातिल का खुद-ब-खुद क़त्ल -ऐ -आम हो गया

    उसकी गैरत से कब भला मेरा वास्ता न था ,
    उसकी निगाहों में मेरा और कोई इंतज़ाम हो गया

    सुर्खिआं अखबार की बन जाओगे क़त्ल कर भी ‘अरमान’
    तिरी नादानिओं का देख कैसा बद अन्जाम हो गया

    राजेश ‘अरमान’

  • कविता — बिका हुआ खरीददार

    कविता — बिका हुआ खरीददार

    बेशक; तुम खरीद लोगे!
    ……………… बिछाओगे
    निचोड़ कर फेंक दोगे; मुझे
    : एक हिकारत के साथ…..

    लेकिन; फिर भी हार जाओगे !
    हाँफती साँसों से यकीनन
    : कैसे पार पाओगे ?

    पीड़ा और समर्पण से गुज़रकर
    मुस्कुराऊंगी : मैं—-विजयी बनकर

    क्योंकि ;
    अपने दाम———–
    मैंने खुद तय किए हैं.

  • बाद मुद्दत के नजर तुमसे मिल गयी है

    बाद मुद्दत के नजर तुमसे मिल गयी है!
    रहगुजर साँसों की फिर से खिल गयी है!
    हरतरफ फैला है ख्वाबों का कारवाँ,
    रोशनी प्यार की रूह से मिल गयी है!

    Composed By #महादेव

  • अपनी सारी जिंदगी बदल गयी

    अपनी सारी जिंदगी बदल गयी

    ****************************************************

    खेल खेलते थे तब भी हम
    आज भी खेलते है
    बस नियम बदल गये
    कुछ नीयत भी बदल गयी

    भागते रहते थे तब भी हम
    हर तरफ़, चारो तरफ़
    आज भी भागते है
    मगर बस साथ बदल गया
    जगह बदल गयी
    वजह बदल गयी

    इक बचपन क्या बदला
    अपनी सारी जिंदगी बदल गयी!

    ****************************************************

  • अपने आप की तलाश

     

    मैं तितलियों की तरह
    उड़ना चाहती थी
    मैं फूलों की तरह
    मुस्काना चाहती थी
    मैं इंद्रधनुष के रंगों सा
    बिखरना चाहती थी
    पर………
    ज़िम्मेदारियों की ज़जीरों ने
    मुझे कैद कर लिया
    घर गृहस्ती की बेड़ियों ने
    मुझे जकड़ लिया

    पूरा घर मेरे कहने से
    चलता था
    सुबह उठने से लेकर सोने तक तिनका भी अपनेआप नहीं हिलता था

    युवावस्था कब बढ़ते बढ़ते
    अधेड़ावस्था तक पहुंच गई
    ज़िदगी यूं ही जीते जीते
    कब दो लोगों में सिमट गई

    आज उस कगार पर खड़ी हूं
    जहां सोचने पर अकेलेपन का
    एहसास है
    आज उस मुकाम पर खड़ी हूं
    जहां अपनेआप को न गिरने देने
    प्रयास है

    आज…..
    मेरी प्रतिज्ञा है
    मैं खुद को तलाशूंगी
    आज मेरी प्रतिज्ञा है
    मैं अपनेआप को संवारूंगी
    तितली की तरह
    पंख फैला कर उड़ूंगी
    फूल की तरह
    खिलखिलाउंगी
    इंद्रधनुष के रंगों सा
    प्यार बिखराऊंगी
    आसमान को छूने के लिए
    दोनों हाथ बढ़ाऊंगी

    जो ख्वाब अधूरे रह गए थे
    उनको पूरा करने के लिए
    प्रयास में कमीं नहीं लाऊंगी

  • मंज़िल

    मंज़िल

    मुस्कुराते हुए तुम चलते चलो,

    गुनगुनाते तुम बढ़ते चलो,

    मंज़िल तुम्हारा इंतज़ार कर रही है हर मोड़ पर,

    तुम बस कदम संभाले चलते चलो,

    रास्ता मुश्किल जितना होगा, उतना सुन्दर परिणाम मिलेगा,

    ये बात जाने तुम बढ़ते चलो।

    बहुत मिलेँगे मंज़िल ऐ मुसाफिर तुम्हे ,

    तुम बस देख उन्हें अपने कदम बढ़ाते चलो ,

    सुन्ना है रास्ते भी इंतज़ार करते है,

    बंजारों का, बस तुम खिल-खिलाते हुए हाथ बढ़ाते चलते चलो।

  • ढूंढ़ता बचपन

    ढूंढ़ता बचपन

    ढूंढ़ता बचपन
    ?
    बस ऐ,ज़िन्दगी मुझे मेरा बचपन लौटा दे।

    Nishit Lodha

    मुझे मेरा वो हस्ता हुआ कल लौटा दे,

    आंसू दे मुझको, पर उन्हें पोछने वाला वो आँचल लौट दे।

    ढूंढता हु में आज कल वो दिन अपने,

    खेलता खुदता वो आँगन लौटा दे।

    बिठा दे मुझको उन कंधो पे और उस आसमान की एक वो ही लंबी सेर करा दे।

    भुला दे हर दर्द ज़िन्दगी के और खेल- मस्ती की वो चोट लगा दे।

    ढूंढता हु में अपना बचपन आजकल हर रास्ते पे बंजारा बन।

    बस माँगता हु ज़िन्दगी से, की ऐ ज़िन्दगी मुझे मेरा वो कल लौट दे और
    वो खिलखिलाता हुआ बचपन लौट दे।
    ?

  • तेरी गली से मैं अचानक जो गुजर गया

    तेरी गली से मैं अचानक जो गुजर गया!
    दर्द तेरा जिगर में एक बार फिर उभर गया!
    खामोशियाँ में ढल गया हर याद का मंजर,
    सिलसिला-ए-अश्क से मेरा दामऩ भर गया!
    Composed By #महादेव

  • टूटे अल्फ़ाज़ों को

    टूटे अल्फ़ाज़ों को

    टूटे अल्फ़ाज़ों को  नसीहत की जरूरत क्या
     बिखरे ख्वाबों को किस्मत की जरूरत क्या

      जो बिक गया खुद ही  सरेआम बाज़ारों में
     फिर   इंसान की कीमत की जरूरत क्या

      हर इक शै का मुक़द्दर जब मुक़र्रर है
      लहूँ में लिपटी वसीयत की जरूरत क्या

     मैंने खुद ही जो इलज़ाम उठा रखे थे
    फिर ज़माने को  हक़ीक़त की जरूरत क्या

                                     राजेश’अरमान’

  • समझते सब है

    समझते सब है

    समझते  सब  है पर मानता कोई नहीं
        पहचान सब से है पर जानता कोई नहीं
      यूँ तो पड़ा हूँ खुली किताब की तरह
         पढ़े लिखे  सब है पर बांचता कोई नहीं

                              राजेश’अरमान’

  • एक वो बचपन

     एक वो बचपन था अल्हड सा
     आज तो सावन भी है पतछड सा
     थक गए ढूँढ़ते अब तो पल वो प्यारे
     खुला आसमान भी मिला पिंजरे सा
    कोई वज़ह नहीं थी कभी दौड़ने की
     अब तो चलता भी हूँ दौड़ने सा
     कहाँ छूट गए वो सुहाने दिन
     था जीवन  फूलों की तरह महका सा
                      राजेश ‘अरमान’

  • उठे जब भी सवाल

    उठे जब भी सवाल

    उठे जब भी सवाल ज़िंदगी की तरफ
    उठे है हाथ मेरे तेरी बंदगी की तरफ
    महज इत्तफ़ाक़ था या और कुछ
    मेरा इशारा है दिल्लगी की तरफ
    वो हर जगह जो मोज़ू था मगर
    नज़र पड़ी बस आवारगी की तरफ
    उन किताबों से हासिल भला क्या
    बढते है कदम किस तिश्नगी की तरफ
    इन्तहा हुई हिस्सों में बटते बटते
    अब चलें किसी पाकीज़गी की तरफ
    राजेश’अरमान’

  • हर शख्स बस

    हर शख्स बस

     हर शख्स बस अपने ही ख्याल बुनता है
     जिसका जवाब नहीं वही सवाल चुनता है

      कोई कैसे कहे वो गुमसुम सा  क्यों है
     जिसे  भी देखिये अपने ही जाल बुनता है

                                       राजेश’अरमान’

  • इक बात जो कभी कही न गयी

    इक बात जो कभी कही न गयी
    इक बात जो कभी सुनी न गयी
    इक बात जो कभी हुई भी नहीं
    बो बात में अब कहूं कैसे ?

  • गांव गांव में नगर नगर में बीमारी

    गांव गांव में नगर नगर में बीमारी !
    यज्ञ हवन में धूप अगर में बीमारी !!
    निजपूँजी के हवस ने ऐसा कर डाला!
    वही लुटेरी डगर डगर में बीमारी !!

  • मुझमे में हु कही…

    मुझमे में हु कही…

    आईना में अक्सर देखा खुद को जब मैंने कही ,
    चहेरे पे चहेरा हर दम दीखता है ,

    वो मासूमियत सा खिलखिलाता बचपन,
    देखू कहा,अब तू बता, ऐ मन,ढूंढ़ता हरदम दीखता है ,

    मंज़िल ऐ सफर ,न कोई फ़िक्र ,
    वो पल-वो कल ,
    वो साथ अपनों का, ढुंढू तो भी अब कहा मिलता है,

    वक़्त की कीमत का उस समय एहसास न था,
    आज कोडी-कोडी कमाने के लिए कोई मुझमे हर दम मिलता है,

    चहेरे पे ढुंढू कहा वो हस्सी अपने बचपन की ,
    अब तो मुस्कुराने में भी मन को सूनापन लगता है ,

    जीना को ज़िन्दगी तो बहुत लम्बी दी, ऐ खुदा ,
    पर सबसे बेहतर जीने में बचपन लगता है।

    one of my best creations
    dedicated,
    Nishit Yogendra Lodha
    kavishayari.blogspot.in
    fb page-kavi shayar

  • मुझको तेरी जुदाई बेइंतहाँ सताती है

    मुझको तेरी जुदाई बेइंतहाँ सताती है!
    शामों-सहर मुझको तेरी याद रूलाती है!
    बिखर रही है जिन्दगी दर्द के पायदानों पर,
    अश्कों में तैरती मुझे मंजिल नजर आती है!

    Composed By #महादेव

  • समस्या

    #देश_में_विधवाओं_का_ये_कैसा_हो_रहा_सम्मान_है ,,
    #लाखो_माएं_बेघर_और_बच्चे_अनाथ_है ,,
    #द्वारिकाधीश_तेरी_नगरी_में_एक_गंभीर_समस्या_है ,,
    #तेरी_गोपियाँ_कलियुग_में_हो_गयी_विधवा_है ………!!
    ……………………………………………~~**#चंद्रहास**~~

  • वो यादें

    वो यादें

    उनसे बिछड़े मुझे एक ज़माना बीत गया,
    याद में उनके रहते एक अफ़साना बीत गया,
    किताबो के पन्नें पलट गए हज़ार ज़िन्दगी के ,
    पर साथ छूटे उनका मेरा ऐसा जैसे संसार मेरा वीराना बीत गया,

    लिखी कहानी जो उन् हज़ार पन्नो पे वो शायद जमाना बीत गया,
    पिके बेहटा हु अपने आप में कही .
    याद में उनके रहता आज भी वो अफ़साना बीत गया ,
    शायद ज़िन्दगी का एक पल और जैसा उनका दीवाना सा बीत गया।

    निशित लोढ़ा

  • ये नज़ारे

    ये नज़ारे
    आसमान को ताकता ढूंढता में वो एक तारा,
    न जाने कहा छुप बेहटा बादलो के बीच कही तो मुस्कुरा रहा है,
    वो पंछी हर राह मुड़ता कही अपना रास्ता बना हवाओ के बीच चलता अपने घर उड़ता चला जा रहा है,
    देखती नज़रे जहा दूर कही चलती दुनिया को,
    अपनी मंज़िल की और बढ़ता जैसे कोई उन्हें जल्द अपने पास बुला रहा है,
    बेहटा में कही गुनगुनाता देखता उन् नज़ारो को हलके हलके यादों के संग एक बात दिल में कही छुपाये ,
    हाय मुस्कुरा रहा है,
    देखो शायद मुस्कुरा रहा है।?
    कवि एव पत्रकार-
    निशित लोढ़ा?

  • चंद यादें

    poetry-on-picture3

    वो दिन थे ये भी दिन हैं वो बचपन था ये जवाँ उम्र ,
    ता उम्र रहेगी याद हमें वो बचपन की प्यारी यादें,

    नभ में बादल छा जाते ही हम बारिश की राह तका
    करते थे ,
    सतरंगी इन्द्रधनुष को देख देख अतरंगी स्वप्न बुना
    करते थे ,
    कागज की नावों में सवार हो भंवरों को पार किया
    करते थे ,
    वो नाँव नहीं वो स्वप्न मेरे जो पानी पर तैरा करते थे ,

    बचपन की सारी यादों को जवाँ उम्र जज्बातों को कागज की नाँव समेटे हैं
    वो वक्त कहाँ है छूट गया लगता है मुझसे वो रूठ गया ,
    आज फिर मैं उसे बुलाऊँगा सपनों के दीप जलाऊँगा,
    पर उन गलियों और चौबारों को मैं कहाँ ढ़ूढ़ फिर पाऊँगा
    उन जिगरी बिछड़े यारों को मैं कहाँ ढ़ूढ़ फिर पाऊँगा ,

    घनघोर घटा फिर छा जाये यादों की बारिश हो जायें ,
    सब यादों को मैं समेट लूँ जज्बातों को भी सहेज लूँ ,

    बस एक बार फिर बादल हो बस एक बार फिर बारिश हो,
    बस एक बार फिर नाव वहीं हो ख्वाबों को ले संग साथ बही जो,

  • शेर

    शेर

    चंद  मुट्ठी  भर  तुफान  से  लड़ेंगे  , शायद  अंदाज़ा  नहीं ,,

    इन्हें  ताकत  मोमबत्तियां  लिए  हजारों  हाथ  की ….!!

    …………….~~**#चंद्रहास**~~

  • हम मर्दों की ख़ास निशानी होती है

     

    1. हम मर्दों की ख़ास निशानी होती है ,,
      हसीं चेहरा देखा नहीं की नियत फिसल जानी होती है …………..!!
    2. चलते चलते निगाहों में बात बन जाती है ,,
      कमबख्त ये गलतफ़हमीयां दूर होते ही उम्मीदे टूट जाती है ……….!!
    3. सारी खुशफहमियाँ रात सपनो में ही आती है ,,
      दूर दूर सपना है पर दिन में ये कल्पना बिखर जाती है ………….!!
    4. हो मेरा भी कोई ,,, अरमाने यूँ आवाज़ देती है ,,
      की दिल तो परोसे बैठे हो पर सौदेबाजी क्यूँ नहीं आती है ??……………!!
    5. कैसे समझाए अब हाल इस आशिकी का ,,
      खामोश होकर भी ये मदहोश रातें बेचैन कर जाती है …………….!!
    6. अजमा ले खुदको भी बड़ा शिकारी समझ कर ,,
      मालूम तो चलेगा कितना अचूक है तेरा भी निशाना हुस्न पर …………..!!
    7. उल्टा चलना रहो पे बदस्तूर आज भी जारी है ,,
      उस काफ़िर के लिए जिसके न होने पर अकेला बिस्तर भारी है ………….!!
    8. जज्बातों की टोकरी इतनी तब भर जाती है ,,
      जब काले लंगूर के साथ एक कमसीन हसीना नज़र मुझको आती है ………….!!

      समझो #चन्द्र अपनी अपनी पसंद का मामला है ,,
      जब खुदा मेहरबान तो गधा भी पहलवान नज़र आता है ………………………….!!

    9. ……………………………………………………………….~~**#चंद्रहास**~~
  • नहीं जाता

    हर मुसीबत को न्योता दिया नहीं जाता ,,
    जरुरत न पड़े तब तक सर ओखली में नहीं जाता …..!!

    सम्मान लौटा रहे हो तो वो पूछेंगे नहीं ,,जिनसे
    नेताओं के बदजुबानी का सवाल पुछा नहीं जाता …..!!

    विशेष राज्य का दर्जा चुनावी मुद्दा कहाँ है ??
    मियां बाहर का कूड़ा घर के अन्दर लाया नहीं जाता …….!!
    माँ का अंचल मेरे लिए घर जैसा है ,,
    जहाँ महफूज़ हूँ जबतक कोई खींच के ले नहीं जाता …..!!

    इंसानी फितरत है दगाबाजों से बचो ,,
    मुसीबत नहीं आती जबतक पाव चादर के बाहर नहीं जाता ……..!!

    मुकम्मल जहाँ के तलाश में लोग जन्नत तक पहुचे ,,
    इंसानी होड़ है वरना चाँद और मंगल तक कौन जाता ……..!!

    आजकल हर जगह दौड़ है आखिर चले किधर ,,
    जिनकी इंसानी चमड़ी से गिरगिट का रंग नहीं जाता …….!!

    ……………………………………………………………………..~~**#चंद्रहास**~~

  • किसी सितम की जब कभी इन्तहाँ होती है

    किसी सितम की जब कभी इन्तहाँ होती है!
    सोती हैं ‘तकदीरें मगर आँख रोती है!
    वक्त के कदमों तले कुचल जाती हैं मंजिलें,
    डूबती तमन्नाओं की सहर कब होती है?

    Composed By #महादेव

  • तेरी कश्ती मेरी कश्ती

    तेरी कश्ती मेरी कश्ती

    तेरी कश्ती मेरी कश्ती

     

    बस इतनी सी तो रवानी है

    हर ज़िन्दगी की कहानी है

    सब कागज की कश्ती है

    और ख़ुद को पार लगानी है

     

    दिखती सब अलग सी हैं

    असल में सब रब सी है

    एक सी ही तो रवानी है

    छोटी सी यह ज़िंदगानी है

     

    एक सी सब बहतीं है

    थपेड़े सब तो सहती हैं

    अपनी अपनी बारी है

    जाने की सब तैयारी है

     

    सबकी अपनी चाले हैं

    कौन किसी की माने है

    किसके हिस्से कितना पानी

    कोई ना यह कभी जाने है

     

    है तो कश्ती को मालूम

    किनारों पे ना ज़िंदगानी है

    बीच गहराईयों में डूबना

    उसके मन की परवानी है

     

    नीचे छत के बस जाना

    कश्ती ने ना जाना है

    लड़ते हुए इन लहरों से

    यूँ ही तो मिट जाना है

     

    तेरी कश्ती मेरी कश्ती

    यूई क्यों कर उलझे हो

    नाचो कूदो हंस खेल लो

    जितने भी पल मौजें हों

                                        ……. यूई

  • कागज की कश्ती

    कागज की कश्ती

    कागज की कश्ती
    जिसमें तैरता था बचपन कभी
    बहता था पानी की तेज धारों में
    बिना डरे, बिना रुके
    न डूबने का खोफ़
    न पीछे रह जाने का डर

    जिंदगी गुजरती गयी
    बिना कुछ लिखे
    जिंदगी के कागज पर
    लिखा था जो कुछ
    घुल गयी उसकी स्याही
    वक्त के पानी में बहकर
    अब खाली खाली सी है जिंदगी
    बहने को तरसती है
    बिना रुक़े, बिना डरे

  • हमें यूं बदनाम होना भी अच्छा लगा

    कर रहे थे बसर जिंदगी गुमनाम गलियों में

    आपकी मोहब्बत ने हमें मशहूर कर दिया

    पुकारने लगे लोग हमें कई नामों से

    हमें यूं बदनाम होना भी अच्छा लगा

    आपका तस्व्वुर हमारे ज़हन में गुंजता रहता है

    ज़हन से उसे जुबां पर लाने का हौसला नहीं

    आपकी यादो ने जो हमें गाने को जो किया मजबूर

    हमें यूं बेसूरा गाना भी अच्छा लगा

    आपका अहसास ही तो हमारी जिंदगी है

    बिना आपके जिंदगी का क्या मायना है

    दो पल शम्मा से गुफ़्तगु करने की खातिर

    परवाने को यूं जलना भी अच्छा लगा

    दिल ए आईने में एक तस्वीर थी आपकी

    तोड दिया वो आईना आपने बडी बेर्ददी से

    मगर अब बसी हो आप हर बिखरे हूए टुकडे में

    हमें यूं टूट कर बिखर जाना भी अच्छा लगा

  • ये बूढ़ी आँखें

    ये बूढ़ी आँखें।

    ये सब कुछ तांके।।

    ये सल भरे पन्ने।

    पुरानी किताबें।।

     

    विशाल से वृक्ष थे।

    जो अब झुक गय हैं।।

    दौड़ते धावक थे।

    जो अब रुक गय हैं।।

     

    कुछ गांठों को।

    ये सुलझा गये हैं।।

    ये सुगंधित पुष्प थे।

    जो मुरझा गये हैं।।

     

    इस समंदर की।

    ये अनुभवी लहर हैं।।

    इनके विचारों।

    से ही सहर है।।

     

    इन की थपकी से।

    निंदिया आती।।

    कहानी,किस्सों से।

    साँझ ढल जाती।।

     

    ये कल की सोचें।

    ये कल में झांकें।।

    ये कल की निगाहें।

    आज कुछ चाहें।।

     

    कपड़ा,खाना और चार दिवारी।

    जिसमे गुंझे बाल-किलकारी।।

    दर्द सहते हैं मन है धरा सा।

    चाहिए इनको प्यार ज़रा सा।।

     

    थोड़ी फरमाइशें।

    थोड़ी सी ख्वाइश।।

    बच्चे बन गए हैं।

    जो कभी थे वाइज़।।

     

    ये ज़िद भी करेंगे।

    तुम चिढ़ न जाना।।

    बस याद कर लेना।

    वो वक़्त पुराना।।

     

    अपमान जो करता।

    वो ज़ुर्मि ज़ालिम है।।

    ऐसे ज़ालिमों का।

    पतन लाज़िम है।।

     

    हर घर में हों।

    दो बूढ़ी आँखें।।

    जो सब को मिलाकर।

    परिवार बना दें।।

     

    हर इन्सां को।

    मेरी हिदायत है।।

    के इन की सेवा।

    ही ज़ियारत है।।

     

    #अश्क??

  • दीया

    लङता अंधेरे से बराबर

    नहीं बेठता थक हारकर

    रिक्त नहीं आज उसका तूणीर

    कर रहा तम को छिन्न भिन्न

    हर बार तानकर शर

    लङता अंधेरे से बराबर

     

    किया घातक वार बयार का तम ने

    पर आज तानकर उर

    खङा है मिट्टी का तन

    झपझपाती उसकी लो एक पल

    पर हर बार वह जिया

     

     

    जिसने तम को हरा

    रात को दिन कर दिया

     

    मिल गया मिट्टी मे मिट्टी का तन

    अस्त हो गया उसका जीवन

    लेकिन उस कालभुज के हाथों न खायी शिकस्त

    बना पर्याय दिनकर का वह दीया

    जिसने तम को हरा

    रात को दिनकर दिया

  • वैराग-चित्‌ संपदा

    वैराग-चित्‌ संपदा

    वैराग-चित्‌ संपदा

     

    कर पाए जब तूं दिल से

    प्रति सुख और दुख के, एक समान उपेक्षा 

    कर पाए जब अंतर मन से

    विभिन भ्रांतियों पर, चिरकाल विजय 

    कर पाए जब यह अनुभूति

    ना इधर कोई राग, ना उधर कोई राग 

    कर पाए जब अपने अन्दर

    हो कर उसकी लौ में रोशन, मातृ सत्य का दर्शन

    कर पाए निर्लेप-निर्मल चित्‌

    जिसमे तूं नही, मैं नही, कोई विचलन नही 

    जान ले,

    पैदा कर पाया अब ख़ुद में

    उसकी मन-भाती,

    संपदा वोह वैराग की

    यूई तेरे इस वैराग-चित्‌ को

    देगा ख़ुद आकर वोह,

    इक दिन अपनी स्वीकृति

                                                          …… यूई

  • गुरु – महिमा

    गुरु – महिमा

    गुरु – महिमा

     

    यह रचना है ,

    गुरु-देव की महिमा का गुनगान ,

    वो ख़ुद के चित्‌ में है अन्तहीन ,

    जिनकी परिभाषा है असीम ,

    ऋषि की विशिष्टताओं का पैग़ाम 

    जो देकर हमको शिक्षा ,

    हमारा ज्ञान ही ना बड़ाए ,हमें ही बड़ा जाए 

    पड़ा कर पाठ हमको,

    जानकारी ही ना दे जाए ,अ‍सलीयत उनकी सिखा जाए 

    सिखा शब्दों के मायने

    मत्लब् ही ना समझा जाए ,उन मायनो से हमे बना जाए 

    दिखा ज़िन्दगी की राहे ,

    पथ-परिदर्शत ही ना कर जाए, जीवन रोशनी से भर जाए I

    किताबी अर्थो को बता ,

    सिर्फ़ विचार ही ना दे जाये, उन विचारों से हमे बदल जाये 

    लूटा अपने ज्ञान का सागर ,

    हमारा रुतबा ही ना बड़ा जाये, हमे सच की राह् में चला जाए 

    दिखा धर्म की साँची रहें ,

    यूई इस जन्म को ही नहीं, जन्मों की राह् मुखर कर जाए 

                                                                                …… यूई 

  • उठाना …. धीरे से

    धीरे से उठाना 

     

    सदियों से गह्न निद्रा में , है सोया यह समाज़ ,

    धीरे से उठाना 

    युगों का अंधकार समेटे , है सोया यह समाज़ ,

    धीरे से उठाना 

     

    इसको सुबह की नहीं कोई ख़बर ,

    युगों से सोया है यह बेखबर  

    भिन्नता में दबा इसका चित्‌  ,

    समानता नहीं इसके मित 

     

    सुलाया इसे इतिहास के थपेड़ों ने ,

    कभी शासन की शमशीरों ने ,

    कभी धर्मों की जंजीरों ने ,

    तो कभी समाज के लुटेरों ने 

     

    पीड़ी दर पीड़ी इसे मार पड़ी ,

    युगों-युग इसकी कब्र गड़ी 

    चाह के भी उठ ना पाएगा ,

    जग कर भी जग ना पाएगा 

                         

    सोना इसका मुकद्दर है ,

    यही मुझे अब बदलना है 

    यूई इस डगर मत गभराना ,

    बस , इसे धीरे से उठाना 

     

    तुझे राह दिखाने आया हूँ ,

    राह दिखा कर जाऊँगा 

    तुझे जगाने आया हूँ ,

    जगा कर ही अब जाऊँगा 

     

    कष्ट जगने में इसको तनिक होगा ,

    खफा मुझ पे यह अधिक होगा 

    युगों-युग जिसने भी इसे जगाया है ,

    इसने उसे ही मौत का जाम पिलाया है 

     

    दिखा इसको रोशनी का संसार ,

    कर दे इसकी रातों को बेकरार 

    जब होगा इसको सुबह का इंतज़ार ,

    तब होगा उठने को यह ख़ुद बेकरार 

                                              …… यूई 

  • ज़िंन्दगी एक दिन की

    ज़िंन्दगी एक दिन की

     

    मेरा हर सुबह मौत के गर्भ से

    ख़ुद को जन्म देना

    हर रात ढले अपने ही कंधों पे

    ख़ुद को मरघट ले जाना

    उस मंदिर के आँगन में,

    ख़ुद को खुद की ही आग में जला देना

     

    मेरे से बेहतर इस जीवन को

    ना कोई ज़ीया , ना जीयेगा

    इस जीवन मेँ , ना जन्म की ख़ुशी

    इस मौत मेँ , ना मरने का ड़र

    ना रोज़ मरते-गिरते रिश्तों के बोझ

    ना झूठे-खोख्ले वायदों की दुनीया

    बस मौत मेरी मेहबूबा

    और मैँ उसका हम-दम

     

    ईधर दिन भऱ मेरे मन में

    एक बेकरारी सी रहती है

    अपनी शाम के इंतज़ार मेँ

    उधर मरघट में मेरी मेहबूबा

    ईत्मिनान  से रहती है

    उसको मालूम है

    यूई  अभी आयेगा

    खुद को जला

    मेरी आग़ोश में बस जायेगा

     

    सबको मालूम है

    यह बसती ही अस्ली बसती है

    यहा बसने वाले

    कभी उजड़ा नही करते

                                   …… यूई 

  • अर्जुन की राह

    अर्जुन की राह

    अर्जुन की राह 

     

    मन मेरा शंकित हो कहता ,

    अर्जुन मैं भी हो जाता , गर सारथी मेरा कृष्ण हो पाता ,

    जीवन मेरा भी तर जाता , गर कृष्ण को मैं ढूंढ़ पता 

     

    चित्‌ मेरा निस्संदेह कहता ,  

    घोड़़ों की लगाम कृष्ण को थमाना , तो एक बहाना था ,

    असल में अर्जुन को , ख़ुद के मन को उसे थमाना था ,

    पा कृष्ण के मन का साथ,अर्जुन चला विजय की राह ,

    मन मेरे भी कृष्ण की चाह, यूई चला अर्जुन की राह 

     

    कहे कृष्ण मंद-मंद मुसकरा के, मन तेरा जब अर्जुन सा भटके ,

    अंतर्मन से मुझे ध्याना , हर चाह तेरी मेरे मन सी होगी

    स्दीवी तो मैं तुझमें बसता, तूने ख़ुद को बाहर भटकाया

    तूने मेरी राह् है पकड़ी, अब तुझे कोई मोह ना जकड़े

    ख़ुद को मेरे रंग में रंग कर, देख नाच उठा अंग अंग तेरा 

     

    हर संशय संदेह त्याग कर, मैंनें उसकी राह पकड़ ली,

    सन्देह रहित चित्‌ मेरे ने, उसको पाने की जिद ठान ली ,

    अज्ञात में ख़ुद को डुबो, निकल गया मैं राह अनजानी ,

    अंतर्ध्यान हो उसको धियाया, उतारा चित्‌ ध्यान में पूरा ,

    उस पूरे में पाया प्रभु पूरा ,तब रोम रोम हुआ कृष्ण में नूरा 

                                                                             …… यूई

  • मृत्यु – एक पड़ाव

    मृत्यु – एक पड़ाव

     

    अंधकार नही ,

    जीवन का द्वार है मृत्यु 

    भय नही ,

    उससे मिलने की राह है मृत्यु 

     

    होता तात्पर्य मृत्यु का मिटना ,

    पर मिटता यहां कुछ भी नहीं ,

    फिर कैसी मृत्यु और कैसा अंत ,

    यथार्थ में मृत्यु कभी होती ही नहीं 

     

    मृत्यु है ही नही मृत्यु ,

    है तो सिर्फ़ मानव के अज्ञान में ,

    मृत्यु नाम है बस एक पड़ाव का ,

    रुक कर जहां, हो जाता मिलना उससे 

     

    यूई गर उसे पाने का नाम है मृत्यु ,

    तो जीते जी क्यों ना वोह राह् चलूँ ,

    जीवन भर मृत्यु को निर्भय सिमर कर,

    जीवन की हर साँस उसमें जी सकूँ 

                                                     …..….. यूई 

  • धर्म-पथ

    ख़ुद को कर्मपथ पे जिवा, धर्मपथ भी निभाना है

    धर्मपथ पर चलते हुए, भूलों को राह दिखानी है

    अपने तन की पीर भुला, औरन की पीर घटानी है

    जिनके अपने भूल चुके, अपना उन्हेँ बनाना है

    हार चुके मनों को , जीत की राह दिखानी है

     

    नाम, वैभव, वित की चाह भुला, परार्थ की राह अपनानी है

    लोग जो तम में बस्ते है, दिल में उनके दीपक की लो जलानी है

    नाउम्मीदी से भरे दिलों को, उम्मीद की किरणों से सजाना है

    जिन्हें लोग तुछ मान चुके, सम्मान उनका लौटाना है

    सबके दिलो में सम्मानता ला, भिन्नता को दफनाना है

     

    यह जो मेरा जीवन है , यह कर्मधर्म का जीवन है

    यूई कर्मधर्म की राहों को, अब सहर्ष निभाना है

    तनमन से अपना इस राह को,

    मानवधर्म को नयी ऊँचाई दिलाना है

                                                       …….. यूई

  • कर्म-पथ

    कर्म-पथ

    कर्मपथ 

    कर्मपथ पर चलना है, कोई दुरमति राह अपनानी नहीं

    मिलेगी उलझी डगर यहां, इसमें कभी घभ्ह्रना नहीं

    बड़ते हुए कठिन राहो पर, भूले से कभी उक्ताना नहीं

    मंज़िल अपनी पाए बिना, मन से कभी सुस्ताना नहीं

    लडते हुए घोरघटाऔ से, सर को कभी झुकाना नहीं

    जीवन आगे बढ़ने का नाम सही, इस पल को कभी गँवाना नहीं

    हो जाये घायल यह देह तो भी, इरादो को कभी डग्म्गाना नहीं

     

    कर्मपथ पर चलते हुए, मुझे अपनी राह बनानी है

    थकना मेरी नियती नहीं, आगे बढ़ना मेरी कहानी है

    मुकाबला नहीं दूसरों से, ख़ुद को ख़ुद से आज़्माना है

    नई मंज़िलों की चाह जगाते हुए, आगे बढ़ते ही जाना है

    चाहे कोई साथ ना दे, ख़ुद पे भरोसा जताना है

    लाखो आएँ बाधाएँ मगर, हटा उनको मंज़िलों को पाना है 

    जीवन की माटी को अपना लहू पिला, फूलों को इसमे खिलाना है

     

                                                                             …….. यूई

  • याद है आज भी वो दिन

    याद है आज भी वो दिन
    जब किताब के बीच
    कोई फूल दबा देते थे
    और खाली लम्हों को
    उस सूखे फूल से महकाया करते थे

    याद है आज भी वो दिन
    किताबों के पन्नें मोड़ देते थे
    इक निशानी के तौर पर क़ि,
    फिर कहाँ से शुरू करना है
    याद रखने के लिए

    याद है आज भी वो दिन
    कुछ जरूरी अध्याय को
    रेखांकित कर देते थे
    ज्यादा ध्यान लाने के लिए
    रंगों से सजा देते थे
    किताबों के जरूरी पन्नें

    याद है आज भी वो दिन
    बिखर जाती थी रोशनाई
    इन किताबों पर और
    चाक के टुकड़े से सोखते थे
    स्याही के धब्बों को, कहीं
    धब्बों का अक्स न पड़ जाये

    अब के दिन याद नहीं रहते
    सुना था ज़िंदगी भी
    एक किताब होती है
    बस किताब समझ कर
    जीने लगे ज़िंदगी
    और बस कुछ न समझा

    अब के दिन याद नहीं रहते
    ज़िंदगी की किताब के
    दबे पन्नो में मुरझाये फूल से
    ख़ुश्बू नहीं मिलती ,सच तो ये
    ताज़े फूलों की खुश्बूं भी
    लगता कोई चुरा ले गया

    अब के दिन याद नहीं रहते
    ज़िंदगी के जरूरी अध्याय
    के पन्नो को मोड़ तो दिया
    पर ज़िंदगी को फिर कहाँ से
    शुरू करना है ये पता ही नहीं
    बस पन्नें मुड़ते ही जा रहे है

    अब के दिन याद नहीं रहते
    रोशनाई बिखर गई है
    ज़िंदगी के बिखरे पन्नो पर
    कोई चाक इसे सोख नहीं पाती
    इनके धब्बों का अक्स गहराता हुआ
    कई पन्नो पर निशां छोड़ गया है

    अब के दिन याद नहीं रहते
    ज़िंदगी के जरूरी अध्याय को
    रेखांकित करता रहा
    अलग अलग रंगों से
    पर इस पर ध्यान नहीं जाता
    अरेखांकित भाग पर ही
    ध्यान टिक जाता है

    अब के दिन याद नहीं रहते
    मैं तुम्हे इक किताब समझ
    जीने लगा था ,पर तुम निकली
    मेरे बिखरे पन्नें ,जिस में कोई फूल
    दबा कर मैं रख नहीं पाया

    ज़िंदगी तुम किताब नहीं
    बस बिखरे पन्नें हो
    बस बिखरे पन्नें
    जिसे बस समेटता
    फिर रहा हूँ रात दिन

    याद है आज भी वो दिन, पर
    अब के दिन याद नहीं रहते

    राजेश’अरमान’

  • अधूरे ख्वाब

    अधूरे ख्वाब

    अधूरे ख्वाब

     

    थे ख्वाब जो चुन-बुन सजाए हमनें

    पा मुझको तन्हा , बहुत तड़पाते हैं .

     

    कारवाँ तेरी यादों का लंबा है ,

    या मेरे ग़मों की रात गहरी है ,

    दशकों बीते, ना क्योँ यह मिटते हैं .

     

    रातों के गहन – प्रगाढ़ अंधेरों में ,

    गहरी क़ब्र खोद रोज़ दफ्नाता हूँ ,

    ना-मुराद लौट ज़िंदा वापस आते हैं ,

    कह्ते हैं,अकेले मिटना गँवारा नहीँ ,

    यूई, हैं चाहे हम अधूरे ख्वाब तेरे ,

    साथ रसमें-ए-वफ़ा पूरी निभाएँगे ,

    संग – संग तेरे ही कब्र में जाएँगे .

                                   …… यूई

     

     

  • ए ज़िन्दगी ……

    ए ज़िन्दगी ……

    ए ज़िन्दगी 

     

    कैसे शिकायत करूँ तुझसे

    खुदा की बंदगी पाई तुझसे

    बस तुझमें सिमटा रह्ता हूँ

    हर पल तेरे ही संग रहता हूँ

     

    कभी टेडी मेडी लकीरों में

    कभी रंग भर उन्ही लकीरों में

    कभी अल्फाज़ बन तकरीरो में

    कभी जज़्बात बन फकीरों में

     

    बस तुझमें सिमटा रह्ता हूँ

    हर पल तेरे ही संग रहता हूँ

    कभी अकेले में, कभी मेले में

    मैं तुझसे मिलता रहता हूँ

     

     

    तेरा हर रंग आंखों में बसाया मैंने

    उनको आँखों से दिल में उतारा मैंने

    उन रंगो में अपना खून मिलाया मैंने

    ऐसे ख़ुदी को तेरे रंग में रंगाया मैंने

     

    तेरी खूबसूरती में ख़ुद को भिगोया मैंने

    तेरी मस्तियों में कूद ख़ुद को तेराया मैंने

    तेरी गहराईयों में उतर इश्क़ रचाया मैंने

    अ‍पनी रूह को तेरे इश्क़ में नहलाया मैंने

     

    तेरे पलों को ज़ज़्बातो से सँजोया मैंने

    उन ज़ज़्बातो को दिल से पिरोया मैंने

    तेरी आग में तप ख़ुद को बनाया मैंने

    बना ख़ुद को तुझे माथे पे सजाया मैंने

     

    बड़ी शिद्दत से यह इश्क रचाया मैंने

    सूख दुःख में एक सा साथ निभाया मैंने

    जब अपने मन को समुंदर बनाया मैंने

    तब तेरी कहानी को मुकमल बनाया मैंने

     

    यूई तो कभसे तुझमें सिमटा बैठा है

    वो तन मन तेरे रंग में रंगा बैठा है

    अब तुम भी युई में सिमटी रहती हो

    हर पल उसके ही रंग में रँगती हो

     

                                       …… यूई

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