अनुभूति से ओतप्रोत
जीवन चलता है
जैसे कोई लहर
जैसे कोई झोँका
जैसे कोई मौसम
बस अनुभूति
ही तो है
अनुभूति से परे
अपने भीतर का
अपने मन का
अपने अंतर्द्वंद का
कोई नाता होता है
किन्तु बिखरा बिखरा
किन्तु टूटा टूटा
इस टूटे टूटे को
जोड़ना जोड़ना होगा
पंछी को खुले आकाश
पे उड़ने के लिए छोड़ना होगा
कहीं पिंजरे में
रहकर कोई पंछी
आकाश को नाप सकता है
नापना आकाश का
उतना अनिवार्य नहीं
जितना अपने को नापना
लहर का अपना
स्वभाव होता है
हिलोरे मारना
महज एक क्रिया नहीं
एक जीवन्ता है
उसके और प्रकृति
के मध्य का सम्बन्ध
क्या कोई सम्बन्ध
इस शरीर का प्रकृति से
स्थापित किया है
इस शरीर के
तत्वों को आलोकित किया है
शब्द मौन
पर ये मौन
अपराधबोध से ग्रस्त
कभी इस मौन
की गूँज से
हो जाओं न
व्यथित असीमित
स्पर्श स्वयं का
कर दे भयभीत
अनुभूति से ओतप्रोत
जीवन चलता है
राजेश’अरमान’















