Category: हिन्दी-उर्दू कविता

  • मुझे याद रहा, तुम भूल गए ……

    मुझे याद रहा, तुम भूल गए ……

    मुझे याद रहा,  तुम भूल गए 

    कहने को दो दिल चार आँखे हम,

    थी एक रूह में बस्ती जान हमारी

    कहने को दिया और बाती हम,

    थी बस लौ ही पहचान हमारी

     

    मदमस्त हवाओं के झोंकों से,

    थे लहराते गाते जज़्बात हमारे,

    उतार सजाया आस्मानो में,

    थे सपने जो जनमें पलकों तले हमारे

     

    कुछ यूँ खाईं थी क़समें हमने,

    हर हाल में प्यार निभाएँगे

    मिल पाए तो ज़िन्दा हैं,

    ना मिल पाए तो यादों में निभाएँगे

     

    हुए गर तन से ज़ुदा तो क्या,

    ज़ुदा ना मन से कभी हो पाएँगे

    गर साँसें छोड़ जाएँ साथ तो क्या,

    जन्मो का साथ निभाएँगे

     

    बरसों से हम उसी मोड़ पे अटके,

    राह जहां से तुम बदल गए

    मोहब्बत को नए मायने दे कर,

    उन मायनों को ही तुम बदल गए

     

    उठा फर्श से अर्श पे बिठा हमको,

    अपना अर्श ही तुम बदल गए

    वफाएँ लेती थी तुमसे सबक वफ़ा का,

    अपना सबक ही तुम बदल गए

     

    जब मुझको सब यह याद रहा,

    कैसे तुम सब भूल गए

    मर के भी यूई भूल ना पाया,

    तुम जिंदा रह के भूल गए                                                                                                                                                                                     …… यूई

  • इशक है – 5

    इशक है

    तेरा ग़ुरबत के वक्त को ,

    मेरी रज़ा मान हाथ जोड़ जाना

    इशक है

    तेरा अपनी हर सफलता को ,

    मेरी दुआ कह जाना

    इशक है

  • इशक है – 4

    इशक है

    तेरा मेरे हर रुप की ,

    बन्दगी में झुक जाना

    इशक है                                   

    तेरा मुझे पाने के इंतज़ार में ,

    नाचते गाते मस्त रहना

    इशक है

  • इशक है – 3

    तेरा बिना ख्वाहिश के ,

    आजन्म मुझसे मिलते रहना

    इशक है

    तेरा मेरी जूठन को भी ,

    चूम कर अपना जाना

    इशक है

  • इशक है – 2

    तेरा बंद आँखों कर ,

    मेरे मन में उतर जाना

    इशक है

    तेरा मेरे नूर में खो ,

    मंद मंद मुस्कराना

    इशक है

  • अहिंसक होना – 4

    अहिंसक होना

     

    है जीवंत जीवन का दर्पण यह,

    प्रतिबद्धता है आजन्म की यह ,

    है ख़ुद की ख़ुद से लड़ाई यह ,

    कर यूई , संपूर्ण अहिंसक हो 

  • अहिंसक होना – 3

    अहिंसक होना

     

    है नही कोई मुखौटा यह ,

    आत्मा का है पह्नावा यह  ,

    है नही कोई दिखावा यह ,

    चित्‌ का है आभूषण यह  ,

  • अहिंसक होना – 2

    अहिंसक होना

     

    अहिंसक विचारों का

    दहन जब कर पाएगा ,

    तब संपूर्ण अहिंसा की राह्

    तूं चल पाएगा 

  • अहिंसक होना – 1

    अहिंसक होना

    ना होना हिंसा का,

    नहीं अहिंसा का लक्षण ,

    तलवार फेंक देने से,

    अहिंसक ना हो पाएगा

  • अजी कैसा विकास करते हो

    अजी कैसा विकास करते हो
    छलों को बाहुपाश करते हो

    जिन पेड़ो से मिलती है साँसें
    उन पेड़ों का विनाश करते हो

    हर चीज़ है, पर समय नहीं
    ख़ुदकुशी का क्यों प्रयास करते हो

    मौन होकर बैठा है घर और
    उस पर क्यों मौन उपवास करते हो

    ठिठक कर सोई है ज़िंदगी
    दीवारों से क्यों उल्हास करते हो

    मुठी बंद कर क्यों बैठे हो
    रेखाओं का उपहास करते हो

    गर तुम ने जहाँ जीता है
    मन फिर क्यों उदास करते हो
    राजेश’अरमान’

  • इशक है – 1

    इशक है – 1

    तेरा साल दर साल ,

    हर सुबेह मुझसे मिलने आना

    इशक है 

    तेरा कुछ ना बोल के भी , सब कह जाना

    इशक है

  • इश्क-ए-खुदाई

    इश्क-ए-खुदाई

    इश्क-ए-खुदाई भी

    कैसा सौदाई है

    सौदाई है

    सौदाई है

    इश्क-ए-खुदाई भी

    कैसा सौदाई है

                                      …… यूई

  • अहिंसक हो – 4

    अहिंसक हो

    मेरे चित्‌ ,

    अहिंसक हो 

    अनैतिक भाव ,

    क्भी नहीं 

    निर्जीव पे वार ,

    क्भी नहीं 

  • अहिंसक हो – 3

    अहिंसक हो

    मेरे चित्‌ ,

    अहिंसक हो 

    जीव हत्या ,

    क्भी नहीं 

    वनस्पति अपमान ,

    क्भी नहीं 

  • अहिंसक हो – 2

    अहिंसक हो

    मेरे चित्‌ ,

    अहिंसक हो 

    दुर्वचन अपशब्द ,

    क्भी नहीं 

    ज्ञान निरादर,

    क्भी नहीं 

  • अहिंसक हो – 1

    अहिंसक हो

    मेरे चित्‌ ,

    अहिंसक हो 

    शस्त्र उपयोग

    क्भी नहीं 

    छल कपट

    क्भी नहीं 

     

                                                ….. यूई 

  • अच्छा है – 9

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो 

    आए सब जहाँ से हम ,

    वहीं तो लौट जाना हैं ,

    जिसके हैं असल में हम ,

    उसमें ही तो स्माना है

  • अच्छा है – 8

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो 

    जिस धन का ना कोई मोल वहाँ,

    उस धन को क्यों कर पाना हैं ,

    वोह धन जो अनमोल वहाँ,

    बस वोही धन यहाँ कमाना हैं

  • अच्छा है – 7

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो

    परम् – सत्य हैं स्दीवी आगे ,

    फिर तूने क्यों मूंदी हैं आँखें ,

    तब पछताए क्या पाएगा,

    अब संभला तो सब संभल जाएगा

  • अच्छा है – 6

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो

    काले कर्म जितने किये यहाँ हैं,

    अकेले देना हिसाब वहाँ हैं,  

    खातिर जिनकी किये कुकर्म यहाँ,

    उनमें होगा ना कोई संग वहाँ

  • अच्छा है – 5

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो 

    समान जो दिखता तेरा मेरा ,

    है यह सब  ना तेरा – ना मेरा ,

    यह सब उस मालिक की माया,

    उसकी रज़ा से इस देह संग पाया

  • अच्छा है – 4

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो 

    सच में तो हैं सब अकेले ,

    फिर भी करते मेले मेले

  • अच्छा है – 3

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो

    नही है कोई यहाँ किसी का,

    ना ही हो तुम भी किसी के 

  • अच्छा है – 2

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो 

    ना कोई आने की राह का साथी,

    ना जाने की राह का कोई नाती 

  • अच्छा है ……

    अच्छा है ,

    जितना जल्दी जान लो

    आते हैं यहाँ सब अकेले,

    जाते भी हैं सब अकेले ,

     

  • इश्क-ए-खुदाई – 7

    इश्कखुदाई

    भी कैसा सौदाई है

    तेरे अंतर्मन

    अपनी जगह बनायी है

  • इश्क-ए-खुदाई – 6

    इश्कखुदाई

    भी कैसा सौदाई है

    खुदी ख़ुद में घोल

    ख़ुद को ही पिलायी है

  • इश्क-ए-खुदाई – 5

    इश्कखुदाई

    भी कैसा सौदाई है

    कैदखुदाई में

    ना कुंडी है ना पहरा है

  • इश्क-ए-खुदाई – 4

    इश्कखुदाई

    भी कैसा सौदाई है

    ख़ुद को ख़ुद में ख़ुद ही

    क़ैद दिलाई है

  • इश्क-ए-खुदाई – 3

    इश्कखुदाई

    भी कैसा सौदाई है

    लाजशर्महयातेह्ज़ीब

    इसने भुलाई है

  • इश्क-ए-खुदाई – 2

    इश्कखुदाई

    भी कैसा सौदाई है

    जग की बेजड़सोचें

    इसने छोडा़ई हैं

  • इश्क-ए-खुदाई – 1

    इश्कखुदाई भी

    कैसा सौदाई है

    मन  डोर झूम के

    यूँ तुझमें बंधायी है

  • है इरादा गर अटल

    माना के यह राह् है कुछ जटिल

    समाने का मुझमें है इरादा गर अटल

    तो मुश्क़िल हर पार तूँ कर जाएगा

    काँटों पे चल समा मुझमें जाएगा

  • सकून

    दहक रही है जो आग तुझमें

    मिलेगा सकून उसे मिल मुझमें

    सिमटने की मुझमें तेरी बेकरारी

    है मुझे अपनी ख़ुदाई से भी प्यारी

  • मैं – तूँ

    हूँ मैं जो रौशनी

    है तूँ भी वही रौशनी

    हूँ तूँ जो रौशनी

    है मैं भी वही रौशनी

  • ज़िन्दगी ना थी – 11

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी,

    जैसी तुम्हारी

    इस ज़िन्दगी के बाद भी

    यूई के बुलंद हौंसलों पे

    दुश्मन भी इतराते हैं 

  • ज़िन्दगी ना थी – 10

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी,

    जैसी तुम्हारी

    इस ज़िन्दगी के बाद भी

    सामने मेरे आने से

    अब तूफान भी घभराते हैं

  • ज़िन्दगी ना थी – 9

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी,

    जैसी तुम्हारी

    इस ज़िन्दगी के बाद भी

    लिया है सीख

    रुख पलट बाधाओं के

    हर हाल में जीना हमने

  • ज़िन्दगी ना थी – 8

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी,

    जैसी तुम्हारी

    इस ज़िन्दगी के बाद भी

    लिया है सीख

    अवरोधों को सर करना हमनें 

  • ज़िन्दगी ना थी – 7

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी,

    जैसी तुम्हारी

    आस्मानी अरमानो के ना थे पंख हमारे,

    जैसे तुम्हारे

  • ज़िन्दगी ना थी – 6

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी,

    जैसी तुम्हारी

    आँखों में ना थे सपने रंगीन हमारे,

    जैसे तुम्हारे

  • ज़िन्दगी ना थी – 5

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी

    बाज़ूओं को ना था कोई सहांरा, जैसा तुम्हारा

  • ज़िन्दगी ना थी – 4

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी

    बचपन ना था बचपन हमारा, जैसा तुम्हारा

  • ज़िन्दगी ना थी – 3

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी

    मजबूरियाँ थी अजब सबकी हमारी, ना जैसी तुम्हारी

  • ज़िन्दगी ना थी – 2

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी

    दीवारें थी कच्ची कमजोर हमारी, ना जैसी तुम्हारी

  • ज़िन्दगी ना- 1 थी

    ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी

    पक्की छत ना थी सर पे हमारी, जैसी तुम्हारी

  • जो हूँ मैं – 8

    जो हूँ मैं वह जिंदा रंगों-छंदों मैँ,

    जो नहीं मैं वह दुनियावी धंधो में

  • जो हूँ मैं – 7

    जो हूँ मैं वह हर पल शिल्पकार है,

    जो नहीं मैं वह मुर्दा बेकार है

  • जो हूँ मैं – 6

    जो हूँ मैं वह अन्दर से हूँ सुंदर,

    जो नहीं मैं वह बाहर हूँ आडंबर

  • जो हूँ मैं – 5

    जो हूँ मैं वह है सबका सदा,

    जो नहीं मैं वह ना किसी का सगा 

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