****सोचना भी मत में कमजोर नहीं**

May 27, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

****सोचना भी मत में कमजोर नहीं ****
मुझे अपना पसंद का चिकन ब्रियनि खाने की तरह सोच कर खाने  की सोचना मत भी मत
मेरे करीब आकर मुझे छूना भी मत , में कमजोर नहीं
ओरत हूँ तो किया अपनी नजरों से नोच नोच कर खाओगे मुझे ? सोचना भी मत आँखों को नोच डालूंगी
माँ के माना  करने  बाद  भी मेने अपने नाखून  बढा लिए हें
माना मेरा जिस्म ,नरम ,नाजुक हैं ,मखमली हैं गोरा हैं , वो मुझे भगवान ने इस लिए बनाया
में एक मासूम को अपनी गोद में माँ बनकर फूलों सा अहसास दे सकूँ ,अपने मखमली आँचल  की छावं  दे सकूँ
तो किया गिद्द जैसी नजरों से  मुझे खरोंच खरोंच कर  खा जाओगे
खुली पलकों से दबोच कर खा जाने की लालसा न रखना वरना मुहं  नोच डालूंगी में
मुझे दिखाई देती हैं कभी कभी लार में लिपटी हुई गन्दी हबस की खामोश लालशा
गंदे गंदे लफ्जों से तो नोच नोच कर न खाने दूंगी तुमको ,सोचना भी मत में कमजोर नहीं
दिल का कालापन देख रही  हूँ मुझे  होठो से छूने की कोशिश न करना
**कमसिन हैं  नाजुक  हैं पर कमजोर नहीं ये ओरत  में ये तुमको बतलाती हूँ
कमजोर नहीं हूँ में सोचना भी मत आज ये जतलाती हूँ में ****
गौरी गुप्ता  २७/५/२०१६

****kal****

May 26, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

***कल ***
एक कल बीत गया,और बीतता ही है कोई नहीं रोक सकता उसे
एक कल जो आने वाला हे आएगा ही वो भी
आज बातें कर लें हम कल ना फिर से आयेगा
कल गैरों ने लुटा अपने घाव दे हैं
रोटी हुई आंखों थे आज भी देख ती हूँ बहते हुये
भॅवर में फसी अंधियारे में दुनिया को किया कोई रौशनी की राह दिखएगा
आज -आज की बात कर लें कल न फिर आएगा
किया करें और किस के लिए करें हम बातें बनाना
और दिल बहला रेत का महल ढह जाना
आखिर ये सब क्यू करें हम
अंध विषबशों के साये में फ़सा हमारा दिल
अपने दिल में जलती हुई लो को कोई किया पहचान करायेगा
कुछ समय के लिये आँखों में चमकते जुगनू
कुछ पलों के लिए सियासी गलियारे
सब कुछ बदल के रख देते हैं अनुमन दीप जहान के
कुछ ही पलों में यहाँ अन्धकार छा जायेगा
आज – आज की बातें कलकर लें ये कल न फिर आयेगा
किया हुआ रेशमा की डोर पकड़ क बचपन चला
रस्से जैसी कस्सी जवानी अंध बिस्वाशों की जनि मानी
करवट बदलजीवन का ये सारांश बन रात के बाद सवेरा हैं।
हर झूठ पर सच्चाई का सेहरा हैं
कर दो खुद को इसके नाम ,देश के ऊपर खुद को न्योछावर
ये मौका फिर न मिल पाएगा
हमाज क- आज की बात करें ये बीता हुआ कल न वापिस आयेगा
गौरी गुप्ता २८ /४ /२०१६

माँ का दूध या सतनो का जोड़ा

May 19, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

************माँ का दूध या सतनो का जोड़ा ,किस नजर से देखे दुनिया सारी **********************
हमेशा देखा है राह चलते लोग रिश्तेदार यहां तक की अपने दोस्त यार तक ,महिलओं को घूर घूर के देखते हें
उनके वक्ष सथल को
अगर किसी ने दुप्पटा डाला हुआ है तो भी सरक जाये वो
एक झलक उस पल के लिए मचलते हें
सारी पहनती हैं तो उसकी कमर और ब्ब्लाउज से अंदाजा लगाया जाता हैं ,उसके स्तन कैसे होंगे हद हैं आज जिनस टॉप डालती हें लड़कियां तो मुनासिब है दुप्पटा न लेना उनको ऐसे गुह्रा जाता है किया बोलूं में
—-में उन सभी बैचेन लालायित आत्माओं को बस इतना ही कहना चाहती हूँ की
जिन मर्यादाओं को अक़्सर वो भूल जाते हें
वह सिर्फ मेरे शरीर का हिस्सा भर हैं ठीक वैसे ही जैसे .मेरे होठ ,मेरी आंखें मेरे हाथ ,पाव , नाक —–
इसी के साथ उन सभी महनुभवों से हाथ जोड़कर विन्ति करती हूँ।
मेरे मन में संदेह न उठने दे नारी हूँ या महज स्तनों का जोड़ा
गौरी गुप्ता १९/५/२०१६

मेरी चिरइया

May 17, 2016 in Other

मेरी चिरइया
मेरी चिरईया कुंदति फांदती , कब बड़ी हो गई मुझे पता ही नहीं चला
ठुमक ठुमक के चलने वाली कब पैरों पर चलने लगी
कभी मचलती इन्ना ,कभी किलकारियों के साथ उसका वो हसना
लेती जब गोद में उसको उठा कैसे मेरे बालों को लेती पकड़ अपनी नन्ही उँगलियों में वो
माथे पर मेरे चम चम करती बिंदिया को कब छुड़ा मुहं में दाल लेती वो और मुस्कुराने लगती
जैसे कोई बड़ी फ़तेह कर ली हो
मेरे दुप्पटे को अपने सर पर ढक लेना और उसके अंदर ताली बजाकर हसना आज भी याद हैं मुझे
बड़ी हुई विद्यालय गई चतुर वो इतनी हर गुण को वो अपनाने लगी
उफ्फ्फ अभी देखो मेरी बांनयी फ्रॉक को पहने कैसे हैं इतराई खुद पर वो
आती जब थक हार कर बोले मुहं बनके जल्दी स दे दो कहाँ जोभी बनया हो तुमने
देखे दाल रोटी मुहं चिढाय वो इतना
कुछ अच्छा सा और बना दो मेरी प्यारी माँ
कुछ मीठा सा कुछ तीखा सा कुछ नमकीन सा
कुछ अपने प्यार जैसा माँ
भर जाये पेट मेरा जिसे खाकर
जैसे तुम्हारा प्यार पाकर हो गई में बड़ी अभी
तुम्हारे प्यार की लालशा रहेगी जीवन भर मेरी मइया
ऐसा बोले हैं वो नैना मटकाऐ के मेरी चिरईया कब बड़ी हुई मुझे पता नहीं
गौरी गुप्ता १७ /५/२०१६

 

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