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Priya Choudhary

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Priya Choudhary

@priya • Joined Jan 2020 • Active 5 years ago

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Priya

by Priya Choudhary

दिल जलाने वाले

February 27, 2020 in शेर-ओ-शायरी

उन्हें पाने की कोशिश में
हम खुद को बुलाते गए
हम दिल लगाते गए
वो दिल जलाते गए

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Priya

by Priya Choudhary

फ्रिज की राह

February 27, 2020 in शेर-ओ-शायरी

सिर न झुकाना अपना
फर्ज की राह में
क्योंकि सर तो झुकेगा सिर्फ
खुदा की पनाह में

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Priya

by Priya Choudhary

हिमालय की हंसिनी

February 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

हिमराज के सौंदर्य रीझे
तपस्विनी सी बैठी थी
नजर को अपने बनाई थी सारंग
शीलीमुख नजरे ऐठे थी
स्वेत वस्त्र वो करे थी
धारण वनमाला गल पहने थी
राजमुकुट सी धरे थी सीस पे
लालू पुष्प की टहनी थी
सजा लिए थे ओस के मोती
अपनी श्वेत पोशाक पे
हंसिनी की हो होड़ नहीं
चाहे गहने पहनो लाख के
शांत सरोवर ने पहना दी
भवर की एक करधनी थी
सरोवर दर्पण देखके रीझे
हिमालय की हंसिनी थी

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Priya

by Priya Choudhary

खूब खेली मोहन मेरे दिल से होली

February 25, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

खूब खेली मोहन
मेरे दिल से होली
नैनों से नींदो की
कर ली है चोरी
तुझसे मिलने पहले
मैं थी चित् कोरी
अब चित मेरा तुझ में
ना मिले कोई ठोरी
तू आकर मिले ना
क्यों मुझसे कठोरी
खूब खेली मोहन
मेरे दिल से होली
पहले तुम ने बांधी थी
प्रेम की यह डोरी
अब रह ना सके तुम बिन
यह ब्रज की छोरी
सुधे मार्ग जाती थी मैं तो
बुलाते थे तुम ही
कहे राधा भोली
खूब खेली मोहन
मेरे दिल से होली
कहती है सखीयाँ
मोय मोहन दिखोरी
तू तू करे है प्रेम
तो काहे तोहे ना दिखोरी
मेरा बनाके मजाक
तुम सताती हो क्यों री
जहां बसे श्याम वहां
रहती है किशोरी

Tags: Holi Par Kavita, Holi Poem in Hindi, Rango par kavita in hindi, रंगों पर कविता, होली पर कविता 10 Comments »

Priya

by Priya Choudhary

महलों की शहजादी

February 25, 2020 in शेर-ओ-शायरी

हंसों के झुंड में बगुलु की आबादी
बूंदों ने की है बादलों से शादी
बैठे हैं बनकर हम कब से मुरादी
एक बार दीदार दे दे
वो महलों की शहजादी

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Priya

by Priya Choudhary

हिंसा की गोली

February 25, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मैं कैसे उड़ा गुलाल
जब भी हिंसा का
धुआं उड़ रहा है
मैं कैसे जलाऊं होली
जब मेरा देश चल रहा है
मैं कैसे खेलू रंग की होली
जब हर जगह तो रक्त पड़ा है
जब यमराज यमलोक छोड़कर
दिल्ली की सड़कों पे खड़ा है
मैं कैसे जाऊं मंगल गीत
जब मातम का रुदन बजा है
मानवता तो त्याग दी तुमने
अब बोलो कीमती धन क्या बचा है
मेहमान बैठा था
घर में तुम्हारी तुम्हारे
उसका लिहाज आया ना
अपनी समूह से हिंसा
करके भारत का है मान बढ़ाया ना

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Priya

by Priya Choudhary

मोहब्बत का आशियाना

February 25, 2020 in शेर-ओ-शायरी

दिल जलाया है हमने एक शमा बनाकर
उजाला जो करना था तेरे मोहब्बत के आशियाने में

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Priya

by Priya Choudhary

मोहोब्बत

February 24, 2020 in शेर-ओ-शायरी

हर किसी से मोहब्बत की यू ही
हांमियां भरना ठीक नहीं
दिल लगाकर दिल तोड़ने की
गुस्ताखियां करना ठीक नहीं
मेरी मोहब्बत का तो खुद
हाफिज गवाह है
मेरी पाक मोहब्बत की
यू बदनामियां करना ठीक नहीं

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Priya

by Priya Choudhary

मैहरम

February 24, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मैं कैसे मोहब्बत को दूं झुकने
जब मेरा मेहरम मुझ में मैं उसमें

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Priya

by Priya Choudhary

सरहद वापसी

February 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कल्पना का कला की छाया नहीं थी
सत्य पांव पसार रहा था
रण भूमि की दहलीज पर जाकर
दुश्मन को ललकार रहा था
दुश्मन की आंखों में देखें
कितनी होशियारी है
पीठ पर बिस्तर बांध लिया
जंग जाने की तैयारी है
लिपट जाता था पिता से बेटा
कभी मां का पल्लू भिगोता था
मां बाबा फिर क्यों जाते हैं
कह कह कर वह रोता था
व्याकुल होती है भ्याता
बिरहा की पीर सताती है
रण मे प्रिय ना विचलित हो
वो असू घूप पी जाती है
दोनों हाथों को रखी थी सिर पर
मां आशीष देती थी
बिस्तर से उठ सकती ना थी
नयन में असू पिरोती थी
पूरी निष्ठा से देता है
भारत माता का पहरा
मेरी अर्थी को भी कंधा देना
जब टूटे सांसों का घेरा

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Priya

by Priya Choudhary

कोयल

February 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

नगर कुमारी देख कर बोली
करूप है कोयल काली
मेरे उपवन आकर लजाए
बैठी कदंब की डाली
मैं सुर के सिंगार से सजती
भले रंग मेरा काला
अभूषण के सिंगार सजे तू
पहन वैजयंती माला
तारे पृथ्वी यह सारा
ब्रह्मांड है काले रंग में
चांद से मुख पर रीझ रही तू
घूमे है कितने घमंड में
नगरधीश है पिता तो रीझे
खोल के चलती केष
ऐसे नगर मेरे पांव तले हैं
रोज मूलांघू प्रदेश
तू महलों की कोठरी में बंद
मेरा भवन प्रकृति
नील सरोवर बनाके दर्पण
देखकर रोज सवरती
तू क्या सोचे तू ही सुंदर
मैं लगती तुझे करूप
कोई तो युक्ति लगा बदल लूं
मैं भी अपना रूप
नगर कुमारी ऐसे चमके
जैसे हरि का शंख
मैं भी चांद की धूल मरूंगी
करूंगी दूर य काला कलंक

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Priya

by Priya Choudhary

सतयुग वापसी

February 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब शब्दों के बाण चलाने में
मर्यादा ना लागी जाए
जब सभी मन में प्राण यह ले ले
किसी और का हक ना खाएं
जात-पात और ऊंच-नीच के
जब सभी भेद मिटा दिए जाए
तब शायद सतयुग वापस आए
पन्नी में बंद करके बेटियां
जब कचरे में ना फेकी जाए
मेहनत बराबर करने पर भी
बेटो से कभी कम ना खाए
दरिंदों का कभी साया पड़े ना
बेखौफ हो बेटी पढ़ने जाए
तब शायद सतयुग वापस आए
जब भाई भाई के भाव को समझे
कोट कचहरी न समझाने आए
संपत्ति की तराजू में जब
रिश्तो को ना तोला आ जाए
बेमतलब की लडाईयो में जब
छोटे बड़े का लिहाज भी आए
तब शायद सतयुग वापस आए

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Priya

by Priya Choudhary

मोहब्बत की हद

February 24, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तुझसे मोहब्बत से पहले क्या पता था मुझे
मेरे प्यार की अर्जी या एक साथ रद्द होगी
रोज लेता है मेरी मोहब्बत का इंतिहान
तेरे शक के कोई एक हद तो होगी

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Priya

by Priya Choudhary

खजालत का ढोंग

February 24, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मान लिया खुद को खुदा
ले आलम को आगोश में
वो खाता खा गए
खजालत के ढंग मे

खजालत-लजजा

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Priya

by Priya Choudhary

मेरी भोली सी कविता कहीं खो सी गई है

February 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मेरी भोली सी कविता
कहीं खो सी गई है
उसकी मासूम हंसी आंखों से
ओझल हो सी गई है
ये खोई है तर्क वितर्को मैं
इस गद भाषा के फर्को में
आज के इस दर्द को लिखते लिखते
मासूम परी मेरी रो सी गई है
मेरी भोली सी कविता
कहीं खो सी गई है
अब घर बार मिलती नहीं है
खुशियों से अलग हो सी गई है
दर्द भर लिया है
जमाने का खुद में
अब दर्द से विचलित हो सी गई है
नींद उड़ गई है लाढो कि मेरी
तभी नयन में आशु पीरो सी गई है
मेरी भोली सी कविता
कहीं खो सी गई है
कांप जाती है कोठरी मेरी
जब सिसकियो से वो रो गई है
इस संसार की माला में
सच्चाई के मोती पिरो सी गई है
लिपट के रोती है गले से मेरे
मेरा दामन थोड़ा देखो से गई है
मेरी भोली सी कविता
कहीं खो सी गई है

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Priya

by Priya Choudhary

मौत की इच्छा

February 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मेरी कब्र को बनाना
शमशान की दहलीज पे
सुना है वहां सब
अच्छे लोग रहते हैं
मुझे देना है पहरा
उन सभी काफिरों से
जिन से दुखी ये
जिंदा लोग रहते हैं
जीवन भर गालियां देते हैं
जिस व्यक्ति को
मरने के बाद तो अच्छाई
ढूंढ ही लेते हैं
जीवन गाथा की
खोद कर खाईयाँ
अच्छाई की कहानियां
को बोल लेते हैं
पर मैं भ्रमित ना होंगी
अच्छाइयों के झूठी कहानियों से
मैं तो कर्मों का
पूरा ब्यौरा लूंगी
जिसका हृदय प्रेम का घोतक
बस उसी को
श्मशान के भीतर लूंगी
जिंदा बस्ती से लेकर अच्छाई
श्मशान में लाके समेटूगीं
सभी बुराई से दूंगी पहरा
इन्हीं कभी दुखी ना होने दूंगी
जब जिंदा थे तो सुख ना मिला
मैं मौत हूं मरने पर सुख दूंगी

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Priya

by Priya Choudhary

जीवन सत्य

February 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सूरज ने जलन की धूप से जलाया धरा को
तो बादलों ने प्रेम वर्षा कर आ कर पुचकारा
जब वृक्षों से छीन लिया पतझड़ ने शृंगार
तो बहारों के पुष्पों ने आकर दुलारा
जब दुख और दर्द से बड़ी थी बेचैनी
तो सुख में भी आकर चैन से सुलाया
जब सवेरी ने छीना रात का रैन बसेरा
तो शाम ने फिर से पल्ला पसारा
जब नदियों को कम पड़ी धरती की गोद
तो सागर ने अपनी गोद में उठाया
जब पर्वत ने ऊंची की घमंड में निगाहें
तो घाटियों ने उनको भी नीचा दिखाया
एक सत्य तो यही है जीवन की गाथा का
जब मानव ने भुलाया तो प्रकृति ने समझाया

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Priya

by Priya Choudhary

फकीर

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मजाक ना बनाना कभी फक्कड़ फकीर का
राज जाने बैठा है वह जीवन की लकीर का
साधारण लिवाज मे क्या जानोगे उसकी हस्ती
एशो आराम छोड़ आया है वह अपनी तकदीर का

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Priya

by Priya Choudhary

मेहरम की निगाह

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

अलग ही सुकून है खुदा की दिखाई राह में
ऊंचा उठा दिया है मेहरम निगाह

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Priya

by Priya Choudhary

तकदीर बनाने वाले

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

लाखो दर्द सहकर भी रहते हैं खामोश
जिंदगी बिता दी तुम्हारी तकदीर बनाने में
जिनकी एक हंसी देखने को तरसती है मेरी निगाहें
तुम 1 मिनट लगाती हो उनको रुलाने में

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Priya

by Priya Choudhary

सम्राट

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मैं कहती हूं बिल्कुल गरीब है तू
यह जानकर कि तुझ पर संपत्ति विराट है
दौलत से नहीं जो दिलों से राज करें
वही तो असल में होता सम्राट है

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Priya

by Priya Choudhary

दिल ए अजीज

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

आब ए चश्म की नुमाइश ना आंखें करें मेरी
एहतियात से दूर करें अख्ज की भीड़ को
आफताब की किरण भी ना छू सके मुझे
अकिबत की फिक्र है दिल अजीज को

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Priya

by Priya Choudhary

मौत का आगोश

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

ना जाने क्यों लड़ते रहते हैं लोग
जिंदगी बिताते हैं एक दूसरे पर रोष में
ना जाने क्यों सभी भूल जाते हैं
एक दिन सोना होगा मौत के आगोश में

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Priya

by Priya Choudhary

तर्क

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

आकाश से पाताल की होगी बातें
पर बातों का कोई भी तर्क ना होगा
जो शब्दों के सागर से ढूंढे ना मोती
तो मुझ में और मुझमे फर्क क्या होगा

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Priya

by Priya Choudhary

रूहानियत

February 23, 2020 in शेर-ओ-शायरी

रूहानियत नहीं रही
अब तेरे अल्फाजों में
क्या करें मौत तगाजए ने
तुझे रह ही बना दिया

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Priya

by Priya Choudhary

महाकाल

February 21, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तीय विलापम में शुद्ध अपनी विषारी
शक्तिहीन हुए शक्तिशाली
विलाप में भयानक रूप धरा था
शांत करें ब्रम्हा और त्रिपुरारी
त्राहि-त्राहि हो सर्वत्र
नटराजन बदले नक्षत्र
बलशाली भी भय से कँपे
शिव के सामने उठे ना शास्त्र
सुर ,असुर, नर जिनसे डरते
त्रिलोक यह कांपने लगते
क्रोध में जब शिव तांडव करते
लोचन रक्त था त्रिलोचन के
यम भी भागे नयन बोचके
क्रोध में पावक वर्षा करते
प्रलय रूप में अनल अगोचर
गले पड़ी मुंडो की माल
जटा जूट की जटा विशाल
शंकर के सिर भस्म की राख
कालो से ऊपर है महाकाल

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Priya

by Priya Choudhary

जब रुख़ एक मासूम शिशु था

February 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक दिन धरा की गोद में डाला
मैंने अंकुरित बीज
जैसे ईश्वर बांधे खग को
मातृत्व ताबीज
उस बीज को जल दे देती
हो जान कभी अनजान
फिर उस नन्हे शिशु में देखो
दो दिन में पड़ गई जान
फिर धरा की धूल आंखों से हटाए
खुल गई नींद थी गहरी
मेरे मुख को देखकर पूछे
क्या तुम ही हो मेरी पैहरी
शिशु के उस मासूम प्रश्न ने
ह्रदय विजय किया मेरा
शिशु के सिर पर हाथ फेर
हां मैंने दिया था पहरा
सब्र की में बीड़ी में मन बांधा
बड़ा रखा था संयम
रोज सवेरे जल दू वट को
ना तोड़े थी नियम
अचला के आंचल पर बिछी थी
उस धूल की सूखी प्रत
उस आंचल की गोद खड़ा
अब दृढ़ता से एक दरख्त

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Priya

by Priya Choudhary

उन्नत की आंधी

February 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मुझे कैद गुलामी पसंद नहीं
मुझे उड़ने दो मुझे उड़ना है
इस अंबर की रणभूमि में
मुझे खोल के पंख उतरना है
मेरा जीता जीवन मृत् हो गया
घर की चार लकीरों में
मैं उड़ ना सकी मेरे पैर बंधे हैं
हिंसा की जंजीरों मे
कभी बांधा मुझे प्रथाओं में
कभी जिंदा जलाया चिताओं में
अपनी करनी इतराते हैं
अंगार डाल मेरी राहों में
चाहैं कितने जाल बिछाना तुम
जंजीर और ताले लगाना तुम
बढ़ना मुझे उन्नत की राहों पर
चाहे कितनी भी पहरे लगा लो तुम
ऐ पहरेदारो कह देना
उन प्रथा के ठेकेदारों से
अब आंधी उठी जो रुक ना सके
छोटी मोटी दीवारों से

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Priya

by Priya Choudhary

उन्नत की आंधी

February 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मुझे कैद गुलामी पसंद नहीं
मुझे उड़ने दो मुझे उड़ना है
इस अंबर की रणभूमि में
मुझे खोल के पंख उतरना है
मेरा जीता जीवन मृत् हो गया
घर की चार लकीरों में
मैं उड़ ना सकी मेरे पैर बंधे हैं हिंसा की जंजीरों में कभी बांदा मुझे प्रथाओं में कभी जिंदा जलाया चिताओं में अपनी करनी इतराते हैं अंगार डाल मेरी राहों में चाय कितने जाल बिछाना तुम जंजीर और ताले लगाना तुम बढ़ना मुझे उन्नत की राहों पर चाहे कितनी भी पहले लगा लो तुम अरे दारु कह देना उन प्रथा के ठेकेदारों से अब आंधी उठी जो रुक ना सके छोटी मोटी दीवारों से

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Priya

by Priya Choudhary

प्रकृति शरण

February 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जहां झर झर झर झर झरने की
आवाज की गुंजन होती हो
जहां धरती निज संतानों को
यूं देख मनोरंजित होते हो
मेरा जी करता वहां जाऊं मैं
कहीं काश वह बस जाऊं मैं
बैठूं वृक्षों की छांव में
देखो अनदेखे राहों को
कभी होड़ करूं मैं हवाओं की
फिर उड़ाऊ में काली घटाओं को
कभी घाटी की गहराई
कभी नापू शिखर की चोटी को
कोमल धूल को दूर उड़ा कर
कंकरिया समेटू छोटी को
नव पत्तों का ओढू दुशाला
पुष्प मेरा परिधान
निझरणी तट पर बैठ कोयल संग
मीठे गाऊ गान

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Priya

by Priya Choudhary

जब महाशक्ति का स्वागत होगा

February 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब महाशक्ति का स्वागत होगा
ढोल नगाड़े करेंगे गुंजन
विशिष्ट परिधान में होगा मनोरंजन
तिलक लगाकर करेंगे अभिनंदन
सब कुछ परंपरागत होगा
जब महाशक्ति का स्वागत होगा
सुरक्षाबलों का होगा घेरा
मीडिया का भी लगेगा डेरा
मेहमान नवाजी देख भारत की
ट्रंप का दिल भी गदगद होगा
जब मां शक्ति का स्वागत होगा
नई नीति पर होगी बातें
वार्ता की दो दिन दो रातें
भारत की मेहमान नवाजी
देखने खड़ा सब जगत यह होगा
जब महाशक्ति का स्वागत होगा
दुश्मनी की डरी दिखेंगी निगाहें
जब दृढ़ होंगी देश की शाखाएं
परिंदा भी पर मार सके ना
सुरक्षाबलों की बाज की निगाहों में
वह प्रांगण सुरक्षा के अंतर्गत होगा
जब महाशक्ति का स्वागत होगा
आएगी सजी भोजन की थाली
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी
सभी प्रांत के व्यंजन के संग
गाय का देसी घृत होगा
महाशक्ति का स्वागत होगा

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Priya

by Priya Choudhary

लेखनी

February 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस लेखनी से लेख लिखे तो
श्याम रचे मतवाले
इस लेखनी से पल में धराधर
अपने केस सवारे
इस लेखनी ने लिख दिखाइ
रामायण की गाथा
भारत के इतिहास को इस बिन
कोई जान न पाता
सारंग थामे बैठी रण मे
भूपो की पटरानी
इसके लेख से बांट रही है
अचला को सेठानी
इसके लेखनी हिला के रख दिए
राजाओं के आसन
फैला कर झोली मांग रहे हैं
अपनी प्रजा से राशन
इसके लेख से हर पन्ने पर
भाषाओं की टोली
मेदिनी बूंद बटोर रही
फैला कर अपनी झोली
इसके लेख ने नाप दिखाया
भारत मां का शीश
सरहद पर मां भेज रही है
बेटे को आशीष

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Priya

by Priya Choudhary

शाहीन बाग

February 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

हर अखबार की खबर में देखो
शाहीन बाग का केस है
सुत का शव गोदी ले बैठी
कैसी ममता का वेश है
उस जगह की राह को घेरा
जहां राह की तंगी है
CAA के विरोध में बांधी
पटिया काली रंगी है
स्कूल ,कॉलेज, दफ्तर जाने में
हो रही सबको को देरी है
काली पट्टी बांध के निकले
कितनी बड़ी अंधेरी है
नागरिकता की फिक्र करो क्यों
जब इसी देश के वासी हो
जब भारत मां जननी मानी
देश से प्रेम के आसी हो
क्या करोगे ऐसे डाल के घेरे
जब नव पीढ़ी मौत से खेले
जिनकी भविष्य के लिए प्रदर्शन
उन्हीं की हंसी के लगे ना मेले
सरकार की नीति से लड़ने
बच्चों के साथ क्यों लाते हो
देश की नव पीढ़ी क्यों
उल्टा सीधा भड़काते हो

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Priya

by Priya Choudhary

आसक्त जीवन

February 17, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जीवन को बिताता है
बेमतलब के दिखावे में
तो स्वार्थ के बिछड़ने कहीं
तेरी किस्मत सोएगी
जब कर्म ब्रह्म लेखनी
एक माला में पिरोए गी
तो आडंबर की होड़
डोर थाम के ना होएगी
कर ले तू सब्र कब्र
खोदती है लालसा
नहीं तो अकेली कहीं
तेरी भियाता रोएगी
आसक्त होना छोड़ दे
तू त्याग दे व्यसन को
अपकारों से दूर देख
जीवन संपन्न को
तू तेज धर ले तरणि सा
काली निशा को छोड़ दे
जो तेरे वृद्ध में बहती है
उन हवाओ का रुख मोड़ दे

आसक्त – मोहित
व्यसन- बुरी आदत
तरणी – सूरज

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Priya

by Priya Choudhary

पुलवामा

February 17, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

देख के जी कांप उठा
पुलवामा की राह को
बोलो कौन थाम पाएँ
बेसहारा बाह को
त्रिनेत्र खोल बैठे
तेरी ओछी चाल पे
भाग काल नाचता है
तेरे अब कपाल पे
ब्याह नहीं मेरा देश है पहले
माना तेरे पैहरे को
गोदी में आ लेटा लाडला
पहन तिरंगी सहरे को
अपने सुत को अग्नि देता
पिता की छाती फटती है
जिसको अपने खून से सींचा
वो धरती कभी बटती है
क्रोध में धरती कांप रही थी
रक्त नयन की आंखों से
भूलते कैसे अग्नि दी है
हमने नन्हे हाथों से
रोकें से भी रुकते ना थे
असु निरंतर आंखों से
पिता याद में रोए लाडली
बातें करती रखो से
अफसोस नहीं आक्रोश बनाया
आतंक के षड्यंत्र से
देख दुश्मन कांप उठा
क्रोध के प्रचंड से
आतंकी तेरे घर में मारे
ये गौरव की बात है
तुझको मुट्ठी बांध के दे दे
कश्मीर कोई खैरात है
कुछ पल में ही ध्वस्त कर दिया
तेरे नए अरमानों को
घंटो तूने पकड़ा योद्धा
चलाना सिखा विमानों को
युद्ध बंदी बना के रख लूं
सोचा अभिनंदन को
ऐसा कोई देश नहीं जो
बांध ले भारतीय नंदन को
बड़ा इठलाता था तू
आतंक की पिटारी पे
नष्ट करके सूर लोटा
देख ले अटारी पे
मासूमों को मार रहा तू
आज की तस्वीर है
भारत हाथो नष्ट होना
अब तेरी तकदीर है

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Priya

by Priya Choudhary

दावा

February 16, 2020 in शेर-ओ-शायरी

लहरों से टकराने का दावा करने वाले
अक्सर अपने ही आंसुओं में डूब जाते हैं
हमने जो पूछा क्यों गम शुदा हो तुम
तो हम से ही जाने क्यों रूठ जाते हैं

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Priya

by Priya Choudhary

कला कुमारी

February 16, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

निशा अंधेरी काली घाटी
है तेरे काले केश
केशो में फिर हीम के मोती
खूब सजाया वेश
ओस का चुनर ओढ़ के बैठे
लोचन घुंघट डाला
कलानरेश ने आके रची है
ये पर्वत की बाला
चली पवन अट खेली करती
चुनर ले गई खीच
लाज शर्म की मारी छुपती
वो वृक्ष के बीच
काली निशा का कलंक हाकता
आया दिनकर शहरी
दिनकर को ललकार से रोके
एक सतरंगी पहरी
किरण कुंज आगे ना बढ़ियो
दिखे तेरा मन लहरी
कला कुमारी सीस चूनर ना
ऑख ना धरीयो आखरी गहरी

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Priya

by Priya Choudhary

जोगन मीरा

February 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जोगन बनके भटक रही है
एक यौवन की मारी है
तेरे मंदिर में नाच रही है
वो महलों की नारी है
मीरा नाम है पीड़ा पुकारे
उसे नगर के वासी हैं
काली कमली ओढ़ के आजा
दर्शन की अभिलाषा है
महलों की मर्यादा लागी
फिर भी तुझे गरूर रहे
त्याग सिंगार वन माला पहने
कुल हंता राणा कुरूर कहे
तेरे मंदिर के खुलने से
पहले तेरे मंदिर में आती है
नाम तो तेरा लेती कभी ना
तुझको पति बताती है
भूख प्यास उसको नहीं लगती
भक्ति रस में चूर रहे
मीरा मोहन एक राशि
फिर तुम मोहन क्यों दूर रहे

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Priya

by Priya Choudhary

सुनहरी किरण जब मेरी खिड़कियों से झांकती है

February 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुनहरी किरण जब मेरी खिड़कियों से झांकती हैं
सीमेंट देती हूं पर्दे को मैं भी
खिड़कियों के पट खोल के
स्वागत है आपका कहती हूं
रख देती है मेरे मुंह पर
अपने अदृश्य हाथों को
जैसे कोई मां अपने बच्चे को दुलारती हैं
सुनहरी किरण जब मेरी खिड़कियों से झांकती है
एक पल में दुलराती है मुझको
दूजे पल में शैतानी दिखाती है
मेरे आशियाने की लेती है तलाशी
घर की दीवारों पर छलांग लगाती है
खेलती है साथ में आंख मिचोली
बादलों के पीछे से चुपके से ताकती है
सुनहरी किरण जब मेरी खिड़कियों से झांकता हैं

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Priya

by Priya Choudhary

महबूब वतन

February 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

महबूब वतन की रक्षा को शमशीर उठाया करते हैं
कोई पूछे मोहब्बत कितनी है दिल चीर दिखाया करते हैं

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Priya

by Priya Choudhary

प्रेम संपत्ति

February 8, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

उनके कदम लड़खड़ाने लगे हैं
जिसने चलना सिखाया था तुझको
अपने कंधों का सहारा देना
जिसने कंधों पर बिठाया था तुझको
तू फंसा हुआ आडंबर में
तू होड़ करें है कमाई की
अपनी सब शौक पुगाता है
कोई फिक्र है मां की दवाई की
जाने कितनी बार पाखंडी यों की
तू चरण धूल सिर लेता है
प्रथम गुरु तो घर में मां है
कभी उनके कदम छू लेता है
वो हंसकर टाल दिया करते थे
तेरी बचपन की नादानी को
यह उम्र भी बचपन जैसी है
तू समझाकर मनमानी को
तुझ पर दुख की ना धूप पड़े
तुझे पाला था प्रेम आश्रय में
कभी उनकी सेवा न करनी पड़े
उन्हें छोड़ आया वृद्ध आश्रम में
रो जाते हैं तेरी बातों से
जब शब्द के बाण चलाता है
जीवन की कड़ी तपस्या का
सब ज्ञान विफल हो जाता है
तु उनको आंख दिखाता है
जिनकी आंखें धुंधला आई है
तू जग की चमक से भ्रमित हुआ
तभी तेरी यह मती चक्र आई है
चुपके से रात में होती है मां
अभी सुनी सिसकियां रातों में
कभी बैठ कर उससे बातें कर
सुन कितना दर्द है बातों मे
संतान नहीं व्यापारी हो
बस लाभ तलाशते रहते हो
जाने कब संपत्ति नाम लिखें
बस इसी ताक में रहते हो
मां बाप तो खुद संपत्ति है
महा ज्ञानी तपस्वी कहते हैं
यह वह निधि है जिसे पाने को
भगवान तरसते रहते हैं

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Priya

by Priya Choudhary

शीतलता

February 7, 2020 in शेर-ओ-शायरी

मेघ की गोदी से गिरती
बूंद बन कर देखना
मिलता है आशीष
शीतलता में घुल कर देखना

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Priya

by Priya Choudhary

मंच

February 7, 2020 in शेर-ओ-शायरी

यह मंच कला को सौंपा है
इसे कलंकित करना ठीक नहीं
मासूम कला की बस्ती को
दुख रंजित करना ठीक नहीं

रंजित-राशि

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Priya

by Priya Choudhary

कितना सरल था गांव का जीवन

February 6, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कितना सरल था गांव का जीवन
गले में चुन्नी बाल में रीवन
बेरी के नीचे बच्चों की भीड़ थी
बुजुर्ग परिवार की एक दृढ़ रीड थी
दादा की ज्ञान की महफिल का लगना
आंख बचाकर अपना निकलना
चांद तो यूं ही घमंड में चूर था
चुननी पे तारे थे घूंघट में नूर था
लकड़ी की गाड़ी का टूटा खिलौना
मां के पल्लू में सिमट के रोना
चार पाले का खेल पुराना
गली में जाकर कंचे बजाना
बात ना माने के खेलने जाना
पिता का कान पे चाटे बजाना
घंटों पिता की डांट को सुनना
जो ना सुना तो डंडा उठाना
कान तो अपना सुन्न है भाई
आकर बचाती अम्मा ताई
करें शरारत बैठे ना टिक के
हम तो भैया ढीट थे पक्के

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Priya

by Priya Choudhary

सियासी खेल रचाया जा रहा है

February 6, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सियासी खेल रचाया जा रहा है
कुर्सी पाने के चक्कर में
उंगली पर सबको को नचाया जा रहा है
यहां रेस लगी है कुर्सी की
हाथी, साइकिल और सेना की
तोपों को सजाया जा रहा है
सियासी खेल रचाया जा रहा है
मुफ्त का दाना डाल दिया
अब साजिश का जाल बिछाया जा रहा है
पेंशन देखकर विपक्ष पर टेंशन को
बढ़ाया जा रहा है
सियासी खेल रचाया जा रहा है
अपनी मर्यादा भूल गए
शब्दों का बाण चलाया जा रहा है
यहां सियासी रोटी सेकने को
पूरे भारत को जलाया जा रहा है
सियासी खेल रचाया जा रहा है
नाम किसी का काम किसी का
और किसी को फंसाया जा रहा है
नन्हें-नन्हें मासूमों को
उल्टा सीधा भड़काया जा रहा है
अरे क्या पाखंड मचाया जा रहा है
कोई न जाने कौन है काजी
फतवाह सुनने को कौन हो राजी
जोर आजमाइश से मनवाया जा रहा है
सियासी खेल रचाया जा रहा है

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Priya

by Priya Choudhary

कालचक्र

February 5, 2020 in शेर-ओ-शायरी

देखन कि जब उठी लालसा
देखा आँखे मीदं
कालचक्र पर बिछा के पलका
सोया था गोविंद

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Priya

by Priya Choudhary

याचक बालक

February 5, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

हाथों को अपने फैलाकर के
बाबूजी दे तो कहता हूं
कभी मेरे मुंख को देख जरा
मैं रोता बिलकता रहता हूं

उन ठंडी सीत हवाओं मे
उन कड़कती काली घटनाओं में
मैं डरा सहमा सा बैठा हूं
पन्नी छप्पर की छांव में

ना पांव में चप्पल होती है
ना सिर पे कमलिया होती है
बाबू कुछ दे दो खाने को
मेरी भूखी बहन वहां रोती है

यह रोज-रोज की मांगने की
तेरी आदत नहीं बदलती है
गाड़ी में बैठ के कहता है
सिस्टम की सारी गलती है

मैं अनपढ़ अबोध सा बालक बालक हूं
बाबूजी सिस्टम क्या जानू
मांगू तो पेट भर जाता है
मैं अभी तो अभी तो बस इतना मानूं

मैं तो बस हाथ फैलाता हूं
कभी कलम चलाना सिखाया ना
उन बड़े-बड़े स्कूलों में
कभी मेरा नाम लिखा या ना

क्या रखा बड़े स्कूलों में
उन फालतू फंड के रेलों मे
में पढ़ने की इच्छा काफी है
तू जा सरकारी स्कूलों में

पढ़ने की ललक तो होती है
पर खाने के भी लालेहै
राशन की जगह पर जाले
और किस्मत पर बड़े-बड़े ताले है

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Priya

by Priya Choudhary

मयुख

February 5, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कंचन सो तेरो रंग री बावरी
मुख पे कमल की लाली है
हंसों का सिरताज ले बैठी
अब भी झोली खाली है

चीर सरोवर तल में झांकें
तू तो बड़ी मतवाली है
कहते सब संसार को मोहि
तु मृगतृष्णा वाली है

ऊंचे गिरी हिमराज को आकर
सुंदर ताज चढ़ाती हूं
नदी धार मोती की माला
अपनी छवि सजाती हूं

जिन वृक्षन की डालन खेली
उन्हीं में आग लगाई है
हम तो चलो संसार के प्राणी
तू तो सुर की जाई है

आलिंगन में ले ना चाहूँ
सुर संग ऊपर आती हूँ
जब भी प्रण को हाथ लगाउ
राख सामने पाती हूं

घाव अभी ना भरे मेदनी
जख्म पुरानी चोट के
दिनकर ने गोदी में लेके
रक्त पिलाया घोट के

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Priya

by Priya Choudhary

पर्दा

February 3, 2020 in शेर-ओ-शायरी

नारी ने चाहा की पर्दा प्रथा दूर हो उससे
पर लोग हंस रहे हैं उसे बेपर्दा करके
👩‍🏫👩‍🔧👩‍🏭👩‍🔬👩‍🚀👮‍♀👷‍♀👸👱‍♀🤰🤱
आखिर क्यों

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Priya

by Priya Choudhary

जटायु अंत में आंखें खोले

February 3, 2020 in गीत

जटायु अंत में आंखें खोले
हाथ जोड़ के करे वंदना रोता रोता बोली
जटायु अपनी आंखें खोले
जल जो पीले तो वह नहीं पीता राम बचा लो दुखी है सीता
भक्ति रस में डुबके देखो अशू नयन बोले
जटायु अंत में आंखें खोले
खेल रहा जो मौत से क्रीड़ा देखी ना जाती उसकी पीड़ा हरि की गोद में पड़ा हुआ वो माटी का तन डोले
जटायु अंत में आंखें खोलो
अनंत समय हरी पास है मेरे अंधकार आंखों को घेरे
क्या करें कि मैं हरी दर्शन कर लूं एक रट मन में डोले जटायु अंत में आंखें खोलें

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