खुशियों का मतलब पटाखे नहीं,
रोशनी और उल्लास है।
ना समझो गलत बंद करना इन्हें,
प्रदूषण का यह सब सामान है।
पहले ही प्रदूषण से बेदम है आबोहवा
उस पर इस दिन चहु ओर
फैला होता बस धुआं धुआं
हफ्तों तक पटाखों की धुंध में
धूयेऔर घुटन से दम निकला ही जाता है।
निमिषा सिंघल
Tag: दिवाली पर कविता
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दिवाली और पटाखे
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दीपावली
दिल का दीप जलाओ सजनी
आई मधुर दिवाली रे।
प्रेम भाव का तेल भरो और
सेवा सत्य की बाती।
संकल्प ज्योति से प्रज्ज्वलित कर
जगमग कर सुखरासी।।
वीर सपूत को अर्पण करो अबकी
मधुर दिवाली रे।।
दिल का दीप जलाओ सजनी
आई मधुर दिवाली रे।।शुभकामनाओं के साथ
पं़विनय शास्त्री -
दिवाली
दीपों की माला को देखो कैसे सज्जित होती हैं।
चारों तरफ उजाला कारके बस यही प्रज्वलित होती हैं ।
खोकर राग द्वेष को ये चारों तरफ सुगंधित होती हैं।
दीपो की माला को देखो कैसे सज्जित होती हैं।
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देखो फिर आई दीपावली
देखो फिर आई दीपावली, देखो फिर आई दीपावली
अन्धकार पर प्रकाश पर्व की दीपावली
नयी उमीदों नयी खुशियों की दीपावली
हमारी संस्कृति और धरोहर की पहचान दीपावली
जिसे बना दिया हमने “दिवाली”
जो कभी थी दीपों की आवली
जब श्री राम पधारे अयोघ्या नगरी
लंका पर विजय पाने के बाद
उनके मार्ग में अँधेरा न हो
क्योंकि वो थी अमावस्या की रात
स्वागत किया अयोध्या वासियों ने
उनका सैकड़ों दीप जलाने के साथ
लोगों के हर्ष की सीमा न थी
चारों ओर खुशियां ही खुशियां थी
क्योंकि कोई लौट आया था
चौदह वर्षों के वनवास के बाद
इसलिए ऐसी कहते हैं दीपावली
जिसे बना दिया हमने दिवाली
जो कभी थी दीपों की आवली
अब न हम दीप जलाते
खुशियों के
अब तो हम लगाते हैं
झालरों की कतार
दीवारों को ऐसे सजाते हैं
जैसे हो जुगनुओं की बारात
उस सजावट और बिजली के बिल में
निकल जाता है हमारा “दिवाला” हर बार
शायद यहीं सोच हम कहते दिवाली
जो कभी थी दीपों की आवली
तो आओ मनाये एक ऐसी दीपावली
न निकले दीवाला जहाँ किसी का
न हो अँधेरा किसी घर में इस बार
जो ले आये किसी कुम्हार के घर
फिर वहीँ पुरानी दीपावली की बहार
उसका सुना द्वार भी चमके
दीयों की रौशनी से इस बार
उसके घर भी ले आये दीपावली
भूलकर चीन की झालरों की कतार
चलो आओ मनाये ऐसी दीपावली
जो हो दीपों की आवली
चलो पुनर्जीवित करे उसी
संस्कृति और धरोहर को
जो थी हमारी सभ्यता
की पहचान
जिसे ढाँक दिया था हमने
धन कुबेर पाने की इच्छा के साथ
और भूल गए थे हम रीति रिवाज़ सब
इस नयी चमक दमक के साथ
चलो घर के हर कोने को चमकाए
पर सिर्फ दीपों की आवली के साथ
जहां हर तरफ हो दिये ही दिये इस बार
अगर हो सके तो
कुछ फ़िज़ूल खर्ची रोक कर
थोड़ा निकलते हैं अपने घर की गलियों में
जहां तरस रहा हो कोई बच्चा
मानाने को ये त्यौहार
उसके चहेरे पे भी खुशियां लाये
दे कर मिठाई और उपहार
चार दीप उस के घर जलाये
तब लगेगा ये त्योहार
वरना सब दिखावा है बेकार
सच पूछों तो यही अर्थ है त्योहारों का
जो ले आये किसी उदास चेहरे पर बहार
फिर देखना हो जाएगी
तुम्हारी दीपावली की खुशियां
दो गुनी मेरे यार
गर किया तुमने इस पर विचार
तो हर तरफ होंगे खुशियों के दीपक इस बार
और हर कोई कहेगा
देखो फिर आई दीपावली, देखो फिर आई दीपावली
अन्धकार पर प्रकाश पर्व की दीपावली
नयी उमीदों नयी खुशियों की दीपावली
हमारी संस्कृति और धरोहर की पहचान दीपावली
मैंने तो ये सोच लिया है
सदा ऐसे ही दीपावली मनाऊंगी
अपने घर को हर बार दीपों से ही सजाऊंगी
खूब खुशियां बाटूंगी और आशीर्वाद कमाऊँगी
ऐसी होगी मेरी दीपावली इस बार
ऐसी होगी हम सब की दीपावली इस बार
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आओ दिवाली ऐसी मनाएं
आओ दिवाली ऐसी मनाए ,
थोड़ी खुशियां हम भी लुटाए।
जो तरसे इन खुशियों को इन,
आओ दिवाली उन सब की मनाए।थोड़ी मिठाई हम भी खाएं,
थोड़ी उनमें बांट के आए।
हंसते चेहरे देखोगे जब,
खुशियां भीतर पाओगे तब।आओ दिवाली ऐसी मनाए,
थोड़े पटाखे उन्हें दे आए।
दूर सड़क जो देख निहारे,
पटाखे ना होने पर जो मन में हारे।उनकी हार को जीत बनाएं,
थोड़ी खुशियां उन्हें दे आए।
उनकी संग भी दिवाली मनाए।आओ दिवाली ऐसी मनाए!
कुछ नये कपड़े बांट के आए,
पहने उनको देखोगे जब ,
हृदय तुम्हारा जगमग होगा,
चारों तरफ आनंद ही होगा।आओ दिवाली ऐसी मनाए
थोड़ा अन्न हम बांट के आएं,
हम भी खाएं उन्हें भी खिलाएं,
खिलखिलाती हंसी हम पाएं।
आओ दिवाली अब ऐसी मनाए।निमिषा सिंघल
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अब कि बार दिवाली में
अब कि बार दिवाली में….
देश का पैसा देश में रखना
खर्चा मत करना चाइना की लाईट पर
तन मन को प्रशन्नचित रखना
कदम से कदम मिलाकर चलना
मिट्टी के दीपक जलाना
अब कि बार दिवाली में…शुध्द वातावरण शुध्द मन को रखना
भेद भाव जाति पात से दुर रहना
राष्ट्रहित के लिए काम करना
गरीब को भी गरीबी का इनाम मिले
मिट्टी के दीपक जलाना
अब कि बार दिवाली में…..मिट्टी के दिए से बरसाती किड़े मर जाते हैं
देश का पैसा देश में रहता
गरीब का दिवाली भी मन जाता हैं
हो राष्ट्र भक्त देश प्रेमी तो
मिट्टी के दिपक जलाना
अब कि बार दिवाली में…..कला के प्रति समर्पित रहना
परम्परा को जिवन्त रखना
गरीबो को ना रोश दिखाना पैसे की परछाई का
भाईचारे के लिए दिपक खरिदना
मिट्टी का दीपक जलाना
अब कि बार दिवाली में……आने वाली पीढी को
मिट्टी से लगाव सिखना
देश में रहकर देश से ना करना गद्दारी तुम
मिल जुल कर करे प्यार सभी से
मिट्टी का दिपक जलाना
अब कि बार दिवाली में….महेश गुप्ता जौनपुरी