shayari

“जाने दे!”

“जाने दे!”

ღღ__महज़ एक लम्हा ही तो हूँ, गुज़र जाने दे; इस तरह तू जिंदगी अपनी, संवर जाने दे! . ले चलें जिस डगर, दुश्वारियाँ मोहब्बत की; मेरे महबूब अब मुझको, बस उधर जाने दे! . तुझे ठहरना है जिस ठौर, तू ठहर, जाने दे; मुझे क़ुबूल है इश्क़ का, हर कहर, जाने दे! . तू बोलता रहा, और मैं सुनता रहा, खामोश; मुझे भी कहना है बहुत कुछ, मगर जाने दे! . इससे पहले “अक्स”, तू अपना रास्ता बदले; मैं ही मुड़ जाता हूँ, मेरे ... »

मगर कब तक!

मगर कब तक!

ღღ_कर तो लूँ मैं इन्तजार, मगर कब तक; लौट आएगा बार-बार, मगर कब तक! . उसे चाहने वालों की, कमी नहीं है दुनिया में; याद आएगा मेरा प्यार, मगर कब तक! . प्यार वो जिस्म से करता है, रूह से नहीं; बिछड़कर रहेगा बे-क़रार, मगर कब तक! . दर्द अहसास ही तो है, मर भी सकता है; बहेंगे आँखों से आबशार, मगर कब तक! . कहीं फिर से मोहब्बत, कर ना बैठे ‘अक्स’; दिल पे रखता हूँ इख्तियार, मगर कब तक!!…..#अक्स . »

“अलग है”

ღღ_यूँ हर एक शख्स में अब, मत ढूँढ तू मुझको; मैं “अक्स” हूँ ‘साहब’, मेरा किरदार ही अलग है! . झूठ के सिक्कों से, हर चीज़ मिल ही जाती है; पर जहाँ मैं भी बिक जाऊं, वो बाज़ार ही अलग है! . यूँ तो हुस्न वाले, कम नहीं हैं इस दुनिया में; पर जिसपे मैं फ़ना हूँ, वो हुस्न-ए-यार ही अलग है! . यूँ तो इन्तज़ार करना, मेरी फितरत में नहीं शामिल; पर तेरी बात कुछ और है, तेरा इन्तज़ार ही अलग है! . रा... »

ღღ_कभी यूँ भी तो हो

ღღ_कभी यूँ भी तो हो, कि दिल की अमीरी बनी रहे; फिर चाहे तो ज़िन्दगानी, ग़ुरबत में बसर कर दे! . कोई एक शाम फुरसत की, कभी मेरे लिए निकाल; फिर उस मुलाकात में ही, तू शाम से सहर कर दे! . तेरे होठों की मिठास तो, मुझे चख लेने दे एक बार; फिर बाकी की उम्र सारी, गर चाहे तो ज़हर कर दे! . दिन-रात माँगता हूँ, रब से बस तुझको दुआ में मैं; ऐ-काश कि वो तुझको ही, मेरा हमसफ़र कर दे! . सूना लगता है जहाँ सारा, तुझ बिन ऐ-सा... »

Shayari

दर्द है आह! है मोहब्बत में मजा भी तो है इश्क गुनाह है मुसीबत है सजा भी तो है ! दो दो जिस्म में एक जान है रजा भी तो है जिन्दगी है यही फिर भी ये कजा भी तो है !! उपाध्याय… »

“देर तलक”

ღღ_कल फ़िर से दोस्तों ने, तेरा ज़िक्र किया महफ़िल में; कल फ़िर से अकेले में, तुझे सोंचता रहा मैं देर तलक! . कल फ़िर से तेरी यादों ने, ख़्वाबों की जगह ले ली; कल फ़िर से मेरे यार, तुझे देखता रहा मैं देर तलक! . कल फ़िर से तेरी गली में, भटकने की आरज़ू हुई; कल फिर से एक बार, ख़ुद को रोकता रहा मैं! . कल फिर से तेरा एहसास, मुझे छूकर गुज़र गया; कल फिर से तेरी तलाश में, यूँ ही भागता रहा मैं! . कल फिर से मैंने नींद से... »

“ख़ुदा-ख़ुदा करके”

ღღ_तजुर्बे सब हुए मुझको, महज़ उससे वफ़ा करके; दुआ जीने की दी उसने, मुझे खुद से जुदा करके! . मैं कहना चाहता तो हूँ, यकीं उसको अगर हो तो; ग़ैर का हो नहीं सकता, उससे अहद-ए-वफ़ा करके! . मैं मुजरिम हूँ अगर तेरा, सजा जो चाहता हो दे; न ख़ुद से दूर रख तू यूँ, मर जाऊंगा ज़रा-ज़रा करके! . शिकायत है अगर मुझसे, तो बताते क्यूँ नहीं आख़िर; सुकून थोडा तो मिल जाता, हाल-ए-दिल बयां करके! . नज़र किसकी लगी है “अक्स̶... »

“नहीं होता”

ღღ_वो चाँद जो दिखता है, वो सबको ही दिखता है; महज़ देख लेने भर से ही, वो हमारा नहीं होता! . दिन तो कट ही जाता है, कश्मकश में जिंदगी की; तेरे बिन एक पल भी, रातों में गुज़ारा नहीं होता!! . कैसे कह दूँ कि मुझे तुमसे, मोहब्बत ही नहीं है; आख़िर मैं यूँ ही तो बे-वजह, आवारा नहीं होता!! . एक रिश्ता है कई जन्मों से, दरमियान अपने शायद; वरना ज़रा-सी बात में तुम मेरी, मैं तुम्हारा नहीं होता!! . मैं एक शायर हूँ ... »

“कहाँ रहते हो”

“कहाँ रहते हो”

ღღ_हम ढूँढ आए ये शहर-ए-तमाम, कहाँ रहते हो; अरे अब आ जाओ कि हुई शाम, कहाँ रहते हो! . इज्जत ख़ुद नहीं कमाई, विरासत ही सम्हाल लो; कहीं हो जाए ना ये भी नीलाम, कहाँ रहते हो! . रस्मो-रिवाज़ इस दुनिया के, तुझे जीने नहीं देंगे; जब तक मिल जाए ना इक मुकाम, कहाँ रहते हो! . तेरे दिल से जो कोई खेलेगा, तो समझ जाओगे; किसे कहते हैं सुकून-ओ-आराम, कहाँ रहते हो! . अब तुम्ही बताओ “अक्स”, और कैसे तुझे पाऊँ; ... »

“नहीं देखा”

ღღ_मोहब्बत करके नहीं देखी, तो ये जहाँ नहीं देखा; मेरे महबूब तूने शायद, पूरा आसमां नहीं देखा! . तुझमें खोया जो एक बार, फ़िर मिला नहीं कभी; खुद की ही तलाश में मैंने, कहाँ-कहाँ नहीं देखा! . मंज़िल की क्या ख़ता जो, भटकता रहा मैं ही; की जिधर रास्ता सही था, मैंने वहाँ नहीं देखा! . मेरे शहर के सब लोग, अमनपसंद हो गये शायद; एक अरसे से किसी घर से, उठता धुआँ नहीं देखा! . नासमझ हो तुम “अक्स”, जो मासू... »

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