एक संवाद तिरंगे के साथ।

जब घर का परायों का संगी हुआ।

क्रोधित तेरा शीश नारंगी हुआ।

ये नारंगी नासमझी करवा न दे।

गद्दारों की गर्दने कटवा न दे।।

साँझ को अम्बर जब श्वेत हुआ।

देख लेहराते लंगड़ा उत्साहित हुआ।।

श्वेताम्बर गुस्ताखी करवा न दे।

मेरे हाथों ये तलवारें चलवा न दे।।

तल पे हरियाली यूँ बिखरी पड़ी।

खस्ता खंडहरों में इमारत गड़ी।।

ये हरियाली मनमानी करवा न दे।

गुलमटों को अपने में गड़वा न दे।।

तेरा लहराना मुसलसल कमाल ही है।

तेरी भक्ति करूँ क्यूँ?निरुत्तर सवाल ही है।।

तेरी लहरें मेरे रक्त को लहरा न दें।

कहीं हर तराने में तुझे हम लहरा न दें।।

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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