कहीं खामोश लम्हा है

कहीं खामोश लम्हा है,कहीं ये शोर कैसा है,
कहीं पर शाम मातम की,ये सुख का भोर कैसा है!

कहीं मासूम जलते है ,पिघलते मोम के जैसे,
सियासत का कहीं झगड़ा,बढ़ा हर ओर कैसा है!

कहीं दुत्कार, नफरत है,कहीं विषदार ईर्ष्या है,
दिखावे का कहीं देखों,धुँआ घनघोर कैसा है!

कहीं जज्बात जलता है,हमारा शुष्क पत्तों सा,
कहीं रोना कहीं हंसना,दिखाना चोर कैसा है!

बड़ा अफसोस है मुझको,ये ताकत खो रहे है हम,
बना है खून अब पानी, ये खुद पर जोर कैसा है !
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रचना-राजेन्द्र मेश्राम “नील”


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7 Comments

  1. Abhishek kumar - December 16, 2019, 10:37 am

    Good

  2. Pragya Shukla - December 16, 2019, 10:40 am

    Nice

  3. Amod Kumar Ray - December 16, 2019, 12:30 pm

    Mast

  4. देवेश साखरे 'देव' - December 16, 2019, 12:53 pm

    Bahut Khub

  5. Poonam singh - December 16, 2019, 2:41 pm

    Wah

  6. Amod Kumar Ray - December 16, 2019, 9:05 pm

    Good

  7. Satish Pandey - July 13, 2020, 10:26 am

    Good

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