भावना

एक बाबा बरसाने के, प्रतिदिन यमुना में स्नान कर के,
दर्शन करते थे राधा – रानी के।
जीवन का एक भाग यूं ही बिताया,
एक दिन दर्शन करते – करते ,बाबा के मन में विचार आया
कोई लाए नारियल, चूड़ी, कोई बिंदी साड़ी लाया
मैनें तो आज तक राधा रानी को कुछ भी नहीं चढ़ाया।
में भी दूंगा कुछ उपहार, लहंगा,चुनरी या फूलों का हार।
सुबह- सुबह कर के स्नान – ध्यान,
बाबा जा पहुंचे एक दुकान
लहंगा, चूनर, गोटा मिला, अपने हाथों से उसे सिला।
हर्षित होते जाते थे, मंदिर की ओर दौड़े जाते थे।
मंदिर की सीढ़ी पर एक “लाली” आई,
लहंगा, चूनर देख कर मुस्काई,
बोली, बाबा ये लहंगा – चूनर तो मैं लूंगी,
बाबा बोले ये तो ना दूंगा लाली,
कल दिलवा दूंगा दूजी वाली।
ये राधा – रानी के नाम की है, ये तेरे किस काम की है।
लाली भी चंचल -चपल थी,लहंगा – चूनर छीन गई
बाबा बोले ऐसा भी करता क्या कोई, बाबा की फिर अंखियां रोई
मंदिर के अंदर से फ़िर आई आवाज़ एक,
राधा – रानी के परिधान , कितने सुंदर हैं देख।
बाबा भी भागे – भागे आए,
राधा – रानी को वही लहंगा – चूनर पहने पाए।
बाबा ने हाथ जोड़ ,स्पर्श किए राधा – रानी के पांव,
राधा – रानी समझ गई थी, बाबा के मन के भाव।
इसीलिए स्वयं ही आ के ले गई अपना उपहार,
भावना ही सर्वोपरि है, ये समझ ले सारा संसार।
————- जय हो राधा – रानी की🙏

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Responses

  1. वाह, आपकी कविता का भाव और शिल्प दोनों ही उच्च स्तर के हैं, कितना सुन्दर वर्णन है वाह, “कल दिलवा दूंगा दूजी वाली”, में बहुत ही सुन्दर आनुप्रासिक छटा विद्यमान है,

    1. ह्रदय से आभार आपका इन्दु जी।🙏
      आपकी प्रेरणादायक समीक्षा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

      1. वेलकम दीदी
        आप ग्रेट हो
        मेरी फेवरिट हो..

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